अशोक द्विवेदी के दूगो गज़ल

डाॅ. अशोक द्विवेदी

[ क ]

जख्म को दिल में करीने-से सजा लेती हैं
पत्तियाँ, पेड़ का हर ऐब छुपा लेती हैं.

पत्तियाँ जागते एहसास का समन्दर हैं
अपनी हरियाली में, आकाश बुला लेती हैं.

पत्तियाँ वक्त के बदलाव को पढ़ लेती है
उसकी आहट को, इशारों में जता लेती हैं.

उनको परवा‘नहीं, अपमान या सम्मान मिले
आपके वास्ते वे खुद को बिछा लेती हैं.

धूप हो तेज या बारिश हो, आपकी खातिर
पत्तियाँ, कुछ घड़ी इक छत-सा बना लेती हैं.

होके बेलाग कभी, आह भी नहीं भरतीं
वे तो हर शाख से चुपचाप विदा लेती हैं !
[ ख ]

कलम की आँख में तिरता हुआ सपना होगा.
जिन्दा नस्लों के लिए कुछ नया रचना होगा !

इस नये दौर की धड़कन में छुपी है कविता
तुमको पहले उसे अनुभूति में बुनना होगा!

कल की बारिश में, तुम्हें भीगने का लुत्फ मिले
इस लिये, आज कड़ी धूप में तपना होगा !

पाँव के नीचे बिछी दूब का अहसास भी हो
नंगे पाँवों हरे मैदान तक चलना होगा !

यूँ तो आसान है शोहरत मगर उसकी खातिर
बस, बिना रीढ़ के, बाजार में बिकना होगा !

देख के मुझको हुईं बन्द खिड़कियाँ, लेकिन
उनके गुस्से में दबा मीठा-सा झरना होगा !

इस चकाचैंध में, जितना भी खींच ले य’शहर
अन्ततः गाँव ही सम्बन्ध में अपना होगा !!

Leave a Comment