आरक्षण एक अभिशाप

डाॅ. संजय सिन्हा@bhojpuripanchayat.in

आरक्षण उस प्रक्रिया का नाम है जिसमे भारत की सरकार द्वारा सरकारी संस्थानोँ मेँ कुछ पिछड़ी जातियो के लिए सीटेँ रोक ली जाती है।अर्थात उस स्थान पर केवल एक विशेष जाति का व्यक्ति ही काम कर सकता है।यह विशेष जातियाँ वह वर्ग है जिन्हे प्राचीन भारत मेँ निचली जाती का दर्जा दिया जाता था, और इन लोगो को उच्च वर्ग के नीचे उनके आदेशो पर ही जीवन बसर करना पड़ता था। जिस वजह से वे कभी अपना व अपने परिवार का उद्धार नहीँ कर पाते थे। आरक्षण देने में सोच शायद यही रही होगी कि समाज में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले लेकिन आरक्षण के लिए संविधान में जातियों का प्रावधान करके क्या जातिवाद को संवैधानिक नही बना दिया गया? जहाँ एक ओर सूप्रीम कोर्ट ये कहती है की चुनाओ मे जाती तथा धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगा जाना चाहिए तो क्या आरक्षण के रहते ये संभव है ? आखिर समाज को बिभिन्न वर्गो मे बाट कर ही तो आरक्षण दिया जा रहा है, ऐसे मे कोर्ट के आदेश का पालन करना क्या संभव है ?
एक दूसरी और बड़ी समस्या जो परिलक्षित होती है वो है जातिगत वैमनस्य। आरक्षण का जो प्रावधान केवल 10 वर्षो के लिए किया गया था उसे राजनीतिज्ञों के राजनीती का हथियार बना लिया और समय के साथ आरक्षण को बढ़ाते रहे और अपनी राजनितिक रोटिया सेंकते रहे। अगर गरीबी दूर करने की कोशिश वास्तव में कि गई होती आज राजनीती करने के लिए आरक्षण और गरीबी के मुद्दे नही बचते। राजनीती का मूल सिद्धांत तो यही बन गया है कि मुद्दे को जीवित रखो ताकि उस मुद्दे पे राजनीती होती रहे। मुद्दे खत्म हो गए तो जनता से वोट कैसे मांगेंगे?
जातिगत वैमनस्य को नेताओ ने अपनी रोटिया सेंकने के लिए पिछले 70 सालो में खूब पाला पोसा और अब यही वैमनस्य नासूर बन चूका है। आरक्षित वर्ग संतुष्ट नही क्यूंकि जिनको वास्तव में आरक्षण की जरूरत है उनको तो लाभ ही नही मिल रहा और जो सामान्य वर्ग है वो कुंठित है कि योग्य होने के बावजूद उसे मौका नही मिल पा रहा। जैसे जैसे जनसंख्या बढ़ रही वैसे वैसे मौके कम होते जा रहे लेकिन आरक्षण बढ़ता जा रहा है। इससे जातिगत वैमनस्य तो बढ़ ही रहा है साथ ही साथ प्रतिभा पलायन भी हो रहा है। आज देश विदेश में बहुत से भारतीय मूल के लोग बड़े पदो पे कार्य कर रहे जिनको देख के हम गर्व करते की एक भारतीय विदेशो में नाम रोशन कर रहा लेकिन इसका दूसरा पहलु देखा जाए तो ये देश के लिए शर्म की बात है कि देश की प्रतिभाओ को विदेशो का रूख क्यों करना पड़ा? अपने देश में व्यवस्था क्यों नही मिली उनको?
एक अन्य बड़ी समस्या है जो की वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से उत्पन्न हुई है और वो है सेवाओ की गुणवत्ता में कमी। जातिगत आधार पे सीट आरक्षित करना तो समझ आता है लेकिन उत्तीर्ण करने के मानको से समझौता क्यों होता है? चाहे मेडिकल हो या आईआईटी हो या कोई और सरकारी क्षेत्र, आरक्षित कोटे में उत्तीर्ण होने के मानक बहुत ही निम्न है। आश्चर्य नही की देश में सभी स्तर पे सुविधाओ की गुणवत्ता में कमी बढ़ती जा रही। क्या आरक्षण निर्धारित करने वाले प्रशासको को ये लगता है की आरक्षित वर्ग में उच्च कोटि के मानको के लिए योग्यता नही है? वो ऐसा भले न सोचे लेकिन ये जरूर सोचते है कि ये आरक्षण नीति उनके राजनीति के लिए बिलकुल उपयुक्त है। उनको विशवास है कि वो जनता को इसी तरह मुर्ख बना के वोट ले सकते है और जनता इसे बार- बार सिद्ध भी करती है।
प्रश्न ये उठता है कि व्यवस्था में सुधार कैसे हो? ये मुद्दा इतना संवेदनशील बन चूका है और जातिगत वैमनस्य की खाई इतनी गहरी हो चुकी है की इसको सीधे खत्म करना लगभग असम्भव है। एक संभावना ये हो सकती है कि आरक्षित सीटो सामान्य वर्ग के कोटे से न काटा जाए बल्कि उनकी सीटें अलग से बधाई जाए और परीक्षाओ में उत्तीर्ण होने के न्यूनतम मानको का फिर से निर्धारण किया जाए ताकि गुणवत्ता बनी रहे। आरक्षण का लाभ एक या दो पीढ़ीओ तक सीमित किया जा सकता है। आरक्षण देते वक्त आर्थिक स्थिति को भी ध्यान दिया जा सकता है और उनमे सामान्य वर्ग के गरीबो को भी जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही साथ शिक्षा का स्तर सुधारने कि जरुरत है खास कर उन क्षेत्रो में जो पिछड़े हुए है। गरीबो को शिक्षित करने के लिए बेहतर योजना बनाने की जरूरत है। आरक्षित वर्ग को राजनीती का शिकार हुए बिना अपना स्वाभिमान जागृत करने की जरूरत है ताकि वर्तमान व्यवस्था को बेहतर किया जा सके और सभी वर्ग मुख्य धारा से जुड़ सके और गुणवत्ता भी प्रभावित न हो। अन्यथा एक समय ऐसा भी आ जाएगा जब ये जातिगत वैमनस्य बढ़ते बढ़ते गृहयुद्ध का रूप ले लेगा।

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