उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकेडमी के मायने

कुछ महीनों पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश में भोजपुरी अकेडमी की स्थापना की घोषणा की गयी थी। इस खबर से पूरे भोजपुरी भाषी लोगों में उत्साह और खुशी का माहौल है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस तरह से इस मुद्दे पर तत्परता दिखाई है उससे एक सकारात्मक संदेश भोजपुरी भाषी लोगों तक जाता है। बीएचयू में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रोफेसर सदानंद शाही, जन भोजपुरी मंच के प्रतिनिधि मण्डल के साथ उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकेडमी की स्थापना के लिए मुख्यमंत्री से मिलने गए थे। उसके कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री ने इसकी घोषणा कर दी। गौरतलब है कि इसके पहले दिल्ली, बिहार और मध्यप्रदेश में भोजपुरी अकेडमी की स्थापना हो चुकी है। यह बड़े ताज्जुब की बात थी कि जिस प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सबसे अधिक संख्या में हों वहाँ ही भोजपुरी अकेडमी न हो। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका संज्ञान लिया और इस पर अमल भी किया। पिछले कुछ वर्षों से भोजपुरी भाषी लोगों की तरफ से उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकेडमी तथा इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लगातार की जा रही थी। दुनिया भर में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। इस भाषा को बोलने और समझने वाले देश के बाहर मॉरिसस, त्रिनिदाद, हॉलैन्ड, नेपाल, फिजी, मारीशस, सूरीनाम, गुयाना, ट्रिनीडाड और
टोबैगो, मलेशिया, थाईलैण्ड जैसे कई देशों में फैले हैं। मॉरिसस के लोगों की तो यह मुख्य भाषा है। नेपाल में तो भोजपुरी को वहाँ की 14 मान्यता प्राप्त भाषाओं की सूची में स्थान दिया गया है। निश्चित रूप से इस खबर से वे भी प्रसन्न होंगे और उत्तर प्रदेश का दूसरे देशों से संबंध प्रगाढ़ होगा। यह आर्थिक रूप से भी फायदेमंद होगा। इससे विदेशी निवेश की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी।
भोजपुरी अकेडमी का सबसे बड़ा काम यह होगा कि वह जिस उद्देश्य से बनाई जा रही है उसे पूरा करे। अर्थात भोजपुरी भाषी लोगों में आत्मविश्वास और जातीय भावना का संचार करे। मशहूर भाषाविद नॉम
चोम्स्की के अनुसार भाषा हमारे अस्तित्व का मूल है। हम सबसे बेहतर अपनी भाषा में ही सोच और समझ सकते हैंय उसे अभिव्यक्त भी सबसे बेहतर अपनी मातृभाषा में ही कर सकते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा होगा की ये 20 करोड़ लोगों में आत्मगौरव का भाव जागृत कर सकेगी। उनमें अस्तित्व बोध जगा सकती है। उन्हें अपने इतिहास और संस्कृति पर गर्व करना सिखा सकती है। सदानंद शाही के अनुसार-
“भोजपुरी आज भी संविधान की आठवीं
अनुसूची में शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकेडमी बनने से अब यह 20 करोड़ लोगों की जुबान बनेगी। केंद्र सरकार पर इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने का दबाव बनेगा। इसका कार्य तब पूरा होगा जब यह भोजपुरी भाषा-संस्कृति के गौरव को वापस ला सके। हमारी आगे आने वाली पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों के बारे में जान सकें, अपने आपको पहचाने, उसे मालूम होना चाहिए कि कुँवर सिंह कौन थे। उसे मालूम होना चाहिए कि चित्तू पांडे कौन थे। उसे इस बात का एहसास होना जरूरी है कि इस देश को बनाने में हम (भोजपुरिया) लोगों का सबसे बड़ा योगदान है।”
भोजपुरी भाषी लोगों ने कूपमण्डूकता से हमेशा परहेज किया है। अपनी गरीबी तथा बेकारी से मुक्ति पाने हेतु उन्होने विदेशों में भी काम की तलाश में जाने से गुरेज नहीं किया । अट्ठारहवीं शताब्दी में गिरमिटिया मजदूर बनकर विभिन्न देशों में गए और अपनी मेहनत तथा दृढ़ इच्छा शक्ति के बल-बूते पर उन्होंने प्रगति एवं विकास की ऐसी गाथा लिखी कि आज वह एक मिसाल है। मारीशस, फिजी तथा ट्रिनीडाड और टोबैगो में तो उन्होंने राष्ट्राध्यक्ष के पद को भी सुशोभित किया है। सर शिवसागर रामगुलाम, वासुदेव पाण्डेय तथा महेन्द्र पाण्डेय ऐसे ही नाम हैं। एक कार्यक्रम में बोलते हुये भारत में मॉरिशस के उच्चायुक्त मुखेश्वर चुन्नी ने कहा था ‘गिरमिटिया बन के गए थे गवर्नमेंट बन गए’। भाषा सर्वेक्षण के लेखक जॉर्ज ग्रियर्सन ने भोजपुरी लोगों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि भोजपुरी वाले साहसी कार्य करने हेतु उत्सुक रहते हैं। हजारों की संख्या में ये मजदूर ब्रिटिश उपनिवेशों में गए। जहां गए वहाँ की धरती को स्वर्ग बना दिया। परंतु आज भी भोजपुरी क्षेत्र के लोग विस्थापन का दर्द झेलने के लिए अभिशप्त हैं। वही लोग बम्बई को मुंबई, कलकत्ता को कोलकाता, और मॉरिशस को धरती का स्वर्ग बनाने वाले हैं। फिर भी उन्हें अपनी जमीन छोड़ कर कहीं और जाना पड़ता है। कुछ महीने पहले बीबीसी की पत्रकार वंदना किसी काम के सिलसिले में लद्दाख में थीं। वे लद्दाख घूम रहीं थीं कि उन्हें एक छोटे से घर से भोजपुरी बोलने की आवाज सुनाई दी। वे अपने को रोक नहीं पायीं और घर में घुस गयीं। उस घर में छः-सात लोग रह रहे थे। सभी भोजपुरी भाषी थे। वे वहाँ मजदूरी करने गए थे। वे वहां सात-आठ वर्षों से रह रहे हैं। वहाँ की खून जमा देनी वाली ठंढ में वे लोग काम करते हैं। भोजपुरी क्षेत्र के लोग मेहनती और काम के प्रति ईमानदार होते हैं।
दरअसल भोजपुरी को मान्यता दिलाने के लिए भोजपुरी भाषी लोग कई सालों से प्रयास कर रहे थे। कमजोर राजनीतिक नुमाइंदगी की वजह से इसे इसका अधिकार नहीं मिल पा रहा। संविधान की आठवीं अनुसूची में अभी भी इसे शामिल नहीं किया गया है। कुछ लोगों का मानना है कि भोजपुरी भाषा नहीं हिन्दी की एक बोली है और इसको आगे बढ़ाने से हिन्दी कमजोर होगी। ऐसी परिस्थिति में हिन्दी, अँग्रेजी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। उनकी यह चिंता निराधार है। भोजपुरी बोली नहीं भाषा हैय और इसके विकास से हिन्दी और मजबूत होगी न कि कमजोर। दो साल पहले सांसद नवीन जिंदल ने हरियाणवी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव सदन में रखा था। चर्चा के दौरान भोजपुरी क्षेत्र के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के सवाल पर जो समिति बनाई गई थी सरकार उसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं करती। समिति ने ऐसी कौन-सी अर्हता निर्धारित की है, जो इन बोलियों (जो आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं) में नहीं है। उनका सवाल जायज था आखिर किस आधार पर डोगरी और अन्य कई भाषाओं को आठवीं अनुसूची में तो शामिल कर लिया गया, लेकिन भोजपुरी अब भी बाहर है। कई ऐसी भाषाएँ भी हैं, जिसे बोलने वाले अब गिने-चुने लोग रह गए हैं लेकिन वह आठवीं अनुसूची में शामिल है और भोजपुरी जैसी भाषाएँ जिनको बरतने वाले करोड़ों में हैं वह अब भी बाहर हैं। इस समस्या का हल एक विद्वान ने बहुत बढ़िया सुझाया था कि आठवीं अनुसूची में सभी भाषाओं को हटा कर बस एक वाक्य लिख देना चाहिए कि भारतीय गणतंत्र में बोली जाने वाली समस्त भाषाएं-बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल की जाती हैं। बस झगड़ा खत्म।
हिंदी के लिए जरूरी है कि वह अपनी बोलियों के प्रति मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखे। साम्राज्यवादी ताकतों का षड्यंत्र यह नहीं है कि क्षेत्रीय बोलियों को महत्त्व देकर हिंदी को कमजोर किया जाए, बल्कि इससे उलट यह है कि हिंदी को बोलियों से अलग करके उसे कमजोर कर दिया जाए। जरूरत है इस षड्यंत्र को समझने की। यह बात कुछ इस तरह कही जाती है गोया हिंदी को सबसे ज्यादा खतरा अंग्रेजी से नहीं, बल्कि उसकी अपनी बोलियों से है, जबकि हम सब इस तथ्य से वाकिफ हैं कि असली खतरा अंग्रेजी से ही है। अंग्रेजी न सिर्फ हिंदी के लिए, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी खतरा है। अतः न सिर्फ भोजपुरी भाषी बल्कि अन्य लोगों को भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस फैसले का स्वागत करना चाहिए एवं भोजपुरी सहित अन्य भाषाएँ जो आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं उनके लिए मिल-जुलकर प्रयास करना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने जिस तत्परता से भोजपुरी अकेडमी की घोषणा की उन्हें उसी तत्परता से उसका गठन भी करना चाहिए। उनके सामने यह भी चुनौती है की इसकी बागडोर सही हाथों में जाए। यह राजनीतिक रूप से भी बेहद फायदेमंद होगा। बहुत दिनों बाद उत्तर प्रदेश को एक योग्य मुख्यमंत्री मिला है। शिक्षित और युवा होने के साथ-साथ वे बेहद शालीन भी हैंय इसीलिए उनसे हम सबकी उम्मीदें बढ़ जाती हैं। हमें पूरा भरोसा है कि वे अकेडमी की बागडोर ऐसे हाथों में देंगे जो भोजपुरी भाषा और साहित्य को दुनिया भर में पहचान दिला सके।  उनके इस योगदान के लिए भोजपुरी भाषी लोग उनके हमेशा आभारी रहेंगे।
  • बृजराज सिंह . हिन्दी विभाग, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीटयूट, दयालबाग, आगरा- 05

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