एक पत्र संत वेलेंटाइन के नाम

संत वेलेंटाइन सुनो !
आजकल बड़ा जलवा है गुरु तुम्हारा । फेसबुक,ट्वीटर, व्हाट्स एप,अख़बार के पन्ने, किसी कालखण्ड का बुद्धू बक्सा आज जो बेहद चतुर और अनिवार्य हो गया है उसमें , हर कहीं,हर ओर तुम्हारी चर्चा है।इतनी चर्चा है कि वसंत का मुख भी पीला पड़ गया है।वैसे पीला सिर्फ तुम्हारी वजह से नहीं खुद उसके चाहने वालों की तरफ़ से भी है।कोयल नहीं कूकती, मंजरियाँ दूर -दूर तक नहीं दीखतीं, मदनोत्सव नहीं होता तो कैसे लोग जान लें कि वसन्त आ गया।नयी -पुरानी पीढ़ी ने मान लिया है कि वसंत अब पत्र-पत्रिकाओं,काव्य-गोष्ठियों में बुलाया-जगाया जाता है। खैर जाने दो वसंत को।बात तुम्हारी हो रही थी,सम्बोधन तुम्हें किया तो तुम्ही सुनो।
तब सुनो, हमारे देश में पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ तुम्हारे प्रेम में पूरा सप्ताह न्योछावर है।धड़कते दिल, उमड़ते जज़्बात से भरे पूरे कार्ड-गुलाब तुम्हारे स्वागत में पलक-पांवड़ें बिछाए हैं।किशोर-युवा सबके दिल की सौ-सौ उमंगे तुम्हारे संत-सनेह के वटवृक्ष के तले अंखुआने लगती हैं।कुछ अंखुवे लहलहाते भी हैं ,तो कुछ असमय ही सूख जाते हैं।
संत! सूखे हुए अंखुए नज़र आते हैं तुम्हें ? अच्छा वे किशोर अँखुवे जिनकी लज्जा से लाल होठों पर तुम्हारे नाम तले किया गया प्रेमिका से मधुर प्रणय निवेदन होता है।जिनके लिए पूरा सप्ताह रोज डे, चॉकलेट डे ,टेडीबियर डे, हग डे, प्रपोज डे अदि-आदि में स्वप्न देखते,कल्पनायें करते बीत जाता है ? नज़र आते हैं तुम्हें !
तुम्हें पता है संत! अपने वेलेंटाइन के लिए ये अबोध किशोर घर-बाहर चोरी करते हैं क्योंकि इनके घर में प्रेम पर चर्चा करना भी नितांत वर्जित है ।और इस छोटी सी लिखने-पढ़ने की उम्र में तो अपराध।हाँ, इनके देश में प्रेम संबंधो पर फिल्में,किस्से कहानी,कविता,उपन्यास गढ़ने-लिखने और खूब प्रचारित करने की बड़ी धूम है।प्रेम में अभिनय करते रुपहले परदे के दृश्यों को देख कर इनका बाल-मन समझ बैठता है कि प्रेम करना और प्रेम में जान दे बैठना अनिवार्य शर्त है।ये जान दे भी देते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में इनकी जान ले ली जाती है।
संत! ज्यादा गंभीर बातें नहीं करते हैं सीधे मुद्दे पर आते हैं।सुनो! यह सप्ताह तुम्हारे कारण हमारे अनेकों किशोरों और युवाओं पर बड़ा भारी गुजरने वाला है और गुजर भी रहा है ।उपहार देने-लेने के लिए उन्हें चोरी तक करनी पड़ी।अखबारों के पन्ने ‘प्रेम-प्रपंच’ में जान लेने -देने की घटनाओं से भरते जा रहे।ज्यादातर कस्बों और छोटे शहरों के किशोर मारे गए और अपनों ने ही उन्हें मारकर जला दिया या दफ़ना दिया।पंचायतों ने प्रेम जैसे अनैतिक कार्य में पड़ने और भाग जाने वालों के लिए गाँव-घर की गलियों पर पहरे बिठा दिया।जो घर के मोह में और क्षमा मिल जाने की अबोध आस लिए आये भी तो उन्हें निर्ममता से या तो मार डाला गया या कालिख पोत गाँव भर में घुमा कर दंडित किया गया।
प्रेम’ के नाम पर इस देश के किशोरों और युवाओं को पहले ही बहुत दंड मिल चुका है वेलेंटाइन! अब तुम भी दिल को दुखाने आये……कई अनजानी हत्याएँ अभी सूचीबद्ध होनी हैं।कई अबोध प्रेम को प्रपंच कहा जाना बाक़ी है…अख़बार के पन्ने ,मिट्टी का तेल, पेड़ों की डालियाँ प्रतीक्षित हैं…अभी वेलेंटाइन तुम्हारा वाला खास दिन आना भी तो बाकी है।

  • डॉ सुमन सिंह

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