एगो भोजपुरिया के चिट्ठी – माननीय पीएम जी की नावे

आदरणीय पीएमजी,
सादर नमस्कार।

इ सही बात बा की देस की सामने बहुत बड़हन-बड़हन समस्या मुँह बवले खड़ा बानीसन। बहुत सारा चुनौती बा रउरी सामने। रउआँ अपनी ओर से पूरा परयासो करतानीं। हँ, हो सकेला की राउर सोंच अउर काम कइले के तरीका अलग होखे, पर देस खातिर कुछ कर गुजरे के बा, देस के आगे ले जाए के बा, रउरी ए परयास,मेहनत पर हमरा कवनो सक-सुबहा नइखे। रउआँ अपनी हिसाब से सही काम क रहल बानी पर जे घर के भा देस के मालिक होला, अगुआ होला ओकरा अपनी ओर से सही-गलत के फैसला करत काम करे के चाहीं पर घर-परिवार-देस की लोगन के भी विचार जाने के चाहीं अउर ठीक लगले पर ओ हू पर विचार करत, ओके जमीनी स्तर पर उतारे के चाहीं। हो सकेला की रउरी अउर रउरी देस-परिवार के नजर सहिए दिसा में देखत होखे पर देखले के तरीका अलग होखे? हो सकेला की कुछ जरूरी कामन के, समस्यावन के, चुनौतियन के रउरों देखत होखीं पर रउआँ इ तना जरूरी ना लागल होखो, जेतना आम मनई की नजर में होखो। ए ही की चलते पता ना काहें हमरा इ लागेला की रउआँ जवन करतानी, ओ हू से जरूरी बा कुछ समस्यावन के समाधान कइल, चुनौतियन के सामना कइल। हमरा लागेला की अगर भारत के अगर भारत बनावे  के बा त सबसे पहिले आर्थिक रूप से पिछड़न पर धेयान देहल, ओ कुल की सुख-सुविधावन पर धेयान देहल जरूरी बा। हँ, पर साथे-साथे सामूहिक विकास,सामूहिक काम कइल भी जरूरी बा, कामन में तालमेल बनावल राखल भी जरूरी बा। जमीनी स्तर पर काम करत, गरीब, किसान, मजदूर के मजबूत करत अगर सामूहिक विकास के काम होई त देस तेजी से विकास की राह पर दउड़ पड़ी। कहल जाला की भारत के आत्मा गाँव में बसेले त भारत के सही विकास तब्बे चरितार्थ होई जब गाँव-गड़ा के विकास होई, जब खेतन में हरियाली आई, गरीब, किसान, मजदूर के चेहरा आत्मसम्मान की साथे-साथे खुसी से चहक उठी।

ए परिपेछ्य में हम एगो अउर बात कहल चाहबि। कुछ जरूरी काम, अति महतपूरन काम एइसन होला, जे केहू खातिर बहुते-बहुत जरूरी होला पर कुछ परिपेछ्य में इ सायद केहू के ओतना महतपूरन ना लागत होई। पर हमार कहनाम बा की देस, समाज, जनता, भाखा,संस्कृति सबके समझ के, हर पहलुअन पर विचार करत रउआँ निर्रनय लेबे के चाहीं। रउआँ देस के विकास के प्राथमिकता दीं पर इ हो समझीं की जवलेक आम मनई के विकास ना हो पाई, देस के विकास संभव नइखे। देस की आम मनई से जुड़ल हर बातन, कामन के विचार करत देस की विकास में सबके जोड़ले के ताक बा।

अब देखीं न रउआँ पता बा की भाखा, संस्कृति के महत्ता का होला? भारत के भारत राखे के बा त भारतीय संस्कृति ही इ काम क सकेला, न की बिदेसी संस्कृति। इ बात रउओं समझतानी तब्बे त काशी से रउआँ चुनाव लरनी। गाय-गंगा-धर्मस्थलन के रउआं महत्ता समझतानी। राजकीय काम में हिंदी के बढ़ावा देहले पर लागल बानी। बिदेसन में जब केहू से मिलनी त उपहार में गीता देहनीं। जब देस से जुड़ल बातन के कहे के मवका मिलल त रउआँ भारतीय समाज, संस्कृति के गुनगान कइनीं। जब रउआँ पूर्वांचल में जानी त भोजपुरी में अभिवादन करेनी, दक्खिन भारत में जानी त तमिल, तेलगु, मलयालम आदि में अभिवादन करेनी। जनता भी आपन सनमान देखी के, भाखा के सनमान देखि के गदगद हो जाले। काहें की देस के अगुआ भइले की नाते रउआँ अपनी देस-परिवार की सब लोगन के विस्वास के, आत्मसम्मान के बना के राखे के बा अउर साथे-साथे रउआँ इ हो पता बा की भाखा, संस्कृति के सेवा क के ही देस के सेवा, जनता के सेवा सही मायने में कइल जा सकेला।

त अब हम अपनी असली बात पर आवत, रउआँ से हाथ जोड़ि के, बिनती करत इ पूछल चाहतानी की जब इ सब रउआँ के पूरा पता बा, त भाखा की नाव पर एतना उपेछा काहें? रउआँ पता बा की मनई के पहिचान ओकरी भाखा,समाज, संस्कृति से होला, भाखा उ कड़ी ह जवन अपनन के जोड़ि के राखेला, ओकरी सम्मान के सूचक होला। आम मनई खातिर भाखा के सम्मान भी सबसे महत्पूरन सम्मानन में से एक होला, पर फिर भी भाखा की नाव पर सरकार काहें धेयान नइखे देत? इ सब जानि के भी काहें रउआँ आँखि मूंदे के कोसिस करतानी। मनई एक बेरा का कई बेरा बिना खइले सूति सकेला, पर अपनी चीजन से, भाखा,संस्कृति, समाज आदि से समझौता ना क सके। रउओं त बार-बार भोजपुरी की साथे-साथे अन्य भाखा की अधिकारिक बोलियन के भाका के दरजा देबे के पुरजोर समर्थक बानीं, फेरु आखिर देरी कवने बात के ले के बा? रउआँ काहें नइखीं आगे बढ़ि के भाखावन के सम्मानित कइले में महत्वपूरन भूमिका निभावत?

करबध चिरउरी बा की ओ भारतीय भाखावन (भोजपुरी के प्रधानता देत- काहें की इ हमार माईभाखा ह) के जलदी से जलदी आधिकारिक दरजा देहल जाव, जवने खातिर रउओं चुनाव आदि की समय आपन सहमति दे देले बानीं, अउर हमरा लागता की संघर्ष करे वाली इ सब भाखा, भाखा की दृष्टि से पूरा तरे संपन्न बानी सन, भोजपुरी त हर बिधा से पूरा तरे संपन्न बिया।

हमरा पूरा विस्वास बा की रउआँ एगो भारतीय, एगो भोजपुरिया की ए बाति पर जरूर गौर करबि अउर हमहुँ के भाखा आदि की सम्मान की साथे जीए के सम्मानित अधिकार देइब। सब भाखावन के सनमान बा, पर भोजपुरी पर अभिमान बा। माईदेस, माईभाखा अउर माई के जे भुलाला ओकर समूल नास हो जाला। माई, माईदेस, माईभाखा, एकर जे कदर ना करे, ओकरा से बड़हन केहू नइखे अभागा। एगो भोजपुरिया के हिरदय के उदगार पर आपन मोहर लगाईं, जल्दी से जल्दी भोजपुरी के आधिकारिक भाखा के दरजा दिलवाईं। भाखा बचाईं, संस्कृति बचाईं, देस बचाईं। जय-जय। सादर।

भवदीय,

प्रभाकर पाण्डेय ‘गोपालपुरिया’

एगो भारतीय भोजपुरिया

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