कूड़े के ढेर पर दिल्ली

याद है न वह दिन, जब दिल्लीवालों ने झाड़ू का सहारा लिया और कांग्रेस, भाजपा आदि को झाड़ू दिखाकर बहरियाते हुए घर-घर में झाड़ू को पनाह दिया। घर-घर झाड़ू का बोलबाला था, हर जगह झाड़ू ही झाड़ू दिखा और केजरीवाल ऐसे झाड़ूमैन के रूप में उभरे कि दिल्ली को सरलता से हथिया लिए। कहते हैं कि झाड़ू सफाई का प्रतीक है, जहाँ झाड़ू है वहाँ सफाई है पर यह बात अब सत्य साबित होती नहीं दिख रही, क्योंकि दिल्ली में झाड़ू तो है पर दिल्ली अब कूड़े, कचरे से पटी पड़ी है, ऐसा लगता है कि दिल्ली कूड़े के ढेर पर आसीन होकर विश्व रिकार्ड बनाने की तैयारी में है।

खैर दिल्लीवालों को केजरीवाल से बहुत ही उम्मीदें थीं और कमान संभालने के बाद केजरीवाल बहुत हद तक अपने वादों को पूरा करना चाहा और इसके लिए कुछ ऐसे हथकंडे भी अपनाए जिसे सही-गलत की कसौटी पर कसना अभी लाजिमी नहीं होगा। जहाँ एक तरफ बिजली के बिल आधे किए वहीं दूसरी ओर कुछ कंडीशन के साथ पानी फ्री कर दिया। केंद्र से कई बार टकराव हुआ, न्यायालय और राष्ट्रपति से भी इन मामलों में हस्तक्षेप करने की गुहार की गई, पूरे देश में, समाचार चैनलों पर, पत्र-पत्रिकाओं में दिल्ली में केंद्र और दिल्ली राज्य सरकार के संबंधों पर चर्चा गरम होती रही पर कुछ हल नहीं निकला। खैर निकलता भी तो कैसे, क्योंकि केवल आरोप-प्रत्यारोप के जो बाण चल रहे थे, चल रहे हैं और शायद चलते रहेंगे। सब अपने को अच्छा दिखाने के चक्कर में दिल्लीवालों के नाक में नकेल कसने के चक्कर में हैं। दिल्लीवाल बेचारा समझ नहीं पा रहा है कि अब ऊँट किस करवट बैठेगा क्योंकि अब वह ऊँट का मालिक नहीं रहा।

इतना ही नहीं केंद्र के साथ-साथ दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम में भी 36 के आकड़ें नजर आनेलगे। निगम अपनी माँगों को लेकर हड़ताल पर हड़ताल करता रहा और झाड़ूमल्लिका दिल्ली अपनी ही सफाई को लेकर परेशान रहने लगी। कूड़े का ढेर बढ़ता रहा और दिल्लीवाल बेचारे देखते रह गए। अब इतना ही नहीं, हप्तों से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में चल रही सफाईकर्मचारियों की हड़ताल में अब तो नगर निगम स्कूल के शिक्षक और अस्पतालों के कर्मचारी भी शामिल हो गए हैं। स्कूलों में ताला बंद, मरीजों का हाल बुरा और कचड़े पर आसीन होती जा रही दिल्ली। हर गली-सड़क पर कचरे का ढेर बीमारियों को आमंत्रित कर रहा है। लोग-बाग नाक पर रूमाल रखकर सड़कों पर आने लगे हैं। केजरीवाल बेचारे इन नगर निगम कर्मचारियों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन तो कर नहीं सकते, इसलिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के जरिए, अपने झाड़ू के उपयोग से कचरे साफ करवाना ही सही समझे पर यह तो ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।

दिलचस्प कहें या उहापोहवाली बात कि शासन के तीनों स्तरों के अंतर्गत आने वाले दिल्ली महानगर में इस बदहाली की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं दिख रहा। सब एक दूसरे पर कूड़ा फेंकने में लगे हैं, कूड़ा उठाने वाला कोई नहीं दिख रहा पर कूड़ा फैलानेवालों की भरमार हो गई है। चाहे बीजेपी शासित नगर निगम हो या ‘आप’ शासित दिल्ली की सरकार, या एनडीए शासित केंद्र की सरकार, सबने बस एक दूसरे के सिर दोष मढ़ने की कसम उठाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है।शासन की विभिन्न एजेंसियों में टकराव होने से आम जनता की कैसी दुर्गति होती है, पिछले कुछ समय से दिल्ली वाले इसके गवाह हैं। बस उन्हें हर स्तर पर गेंद उछलते हुए ही दिख रही है और शायद वे अब केवल उछलती हुई गेंद देखना अपनी नियति मान लिए हैं। गेंद का न कोई माई है न बाप, गेंद कहीं से भी आकर कहीं भी चली जा रही है पर इसके आदि-अंत का पता नहीं चल पा रहा है। राजनीति की इस कई पेंदिया गेंद के चलते दिल्ली अभूतपूर्व अराजकता की ओर बढ़ने से अपने आप को रोक नहीं पा रही है। खैर दिल्ली को आदत है, उछलते हुए कई पेंदिया गेंद को देखने की।

1998 में दिल्ली राज्य में शीला सरकार थी तो केंद्र में अटल बिहारी लगाम वाली एनडीए की सरकार। नगर निगम में भी बीजेपी और कांग्रेस आती-जाती रहीं। इसके बावजूद 2013 तक के 15 वर्षों में एक बार भी न तो इस तरह की अव्यवस्था दिखी और न ही परस्पर दोषारोपण का ऐसा कोई तमाशा देखने को मिला। बेशक, मौजूदा हड़ताल के कुछ तात्कालिक कारण भी हैं और इन पर गौर करके स्थिति सुधारने वाले तात्कालिक उपाय भी जरूरी हैं। मगर जिन ढांचागत वजहों से दिल्ली का यह हाल हो रहा है, उन्हें दूर करने की पहल सरकारों से नहीं हो पा रही तो यह जिम्मेदारी न्यायलय को संभालनी पड़ेगी। अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो दिल्ली की आम जनता को खुद झाड़ू उठाना पड़ेगा और शायद यह झाड़ू सभी पार्टियों पर, केंद्र, दिल्ली राज्य सरकार, नगर निगम पर भारी न पड़ जाए क्योंकि इस गेंद फेंकउल खेल में नुकसान सिर्फ और सिर्फ दिल्ली की आम जनता का ही नहीं पूरे देश का है। दिल्ली भारत की आन, बान व शान है, इससे महकता है हमारा भारत, इसलिए अगर सरकारें, पार्टियां नहीं चेतती हैं तो न्यायालय को अब सामने आ ही जाना चाहिए और जिम्मेदारियों को नियत करने के साथ ही दिल्ली को कचरामुक्त कर देना चाहिए।

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