क्रोधी पर लोक कल्याणकारी थे भगवान परशुराम-लाल बिहारी लाल

भगवानपरशुराम को उनके हठीस्वभाव, क्रोधऔर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। भगवान परशुराम एक उदाहरणहैं कि क्रोध इंसान को बर्बाद कर सकती है, लेकिन अगर हम अपनेक्रोध और अन्य इंद्रियों पर काबू पा लें तो हम भी उतम लोगों की श्रेणी में आ सकतेहैं। भगवान परशुराम विष्णु के छठें अवतार हैं जो वामन एवं रामचंद्र के बीच का कालहै। भगवान परशुराम बैशाख शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया के पुण्य दिवस पर ही अवतरित हुए।इस दिन उनके कर्मों का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता कीसोपान चढ सकता है।
भगवानपरशुराम क्रोधी होने के साथ साथ अत्यंत समझदार, कल्याणकारी औरधर्मरक्षक भी थे। इस विषय में एक घटना बेहद लोकप्रिय है: भगवान परशुराम के पिताभृगुवंशी ऋषि जमदग्नि और माता राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका थीं। ऋषि जमदग्निबहुत तपस्वी और ओजस्वी थे। ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्ववानस और राम(परशुराम) हुए। एक बार रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं। संयोग से वहीं पर राजाचित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर औरआकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी राजा के प्रति आसक्त हो गईं किन्तु ऋषिजमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशितहोकर अपने पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किन्तु परशुराम जोपितृभक्त थे,कोछोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के कारण वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिताके आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर धर से अलग कर दिया। क्रोधित ऋषि जमदग्नि नेआज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने काश्राप दे दिया। वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्णबुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगेपहला- अपनी माता को फिरसे जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा- अपनेचारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा और तीसरा वरदानस्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या किसी भी युद्ध मेंपराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो। इस तरह अपनी बुद्धिमता से परशुराम नेअपनी माता को भी जीवित कर लिया, पिता की आज्ञा का पालनभी किया और अपने भाइयों का भी साथ दिया।
इसघटना के कुछ समय बाद ही एक दिन जमदग्नि ऋषि के आश्रम मेंकार्त्तवीर्य अर्जुन आए। जमदग्नि मुनि ने कामधेनु गौ की सहायता से कार्त्तवीर्यअर्जुन का बहुत आदर सत्कार किया। कामधेनु गौ की विशेषताएं देखकर कार्त्तवीर्यअर्जुन ने जमदग्नि से कामधेनु गौ की मांग की किन्तु जमदग्नि ने उन्हें कामधेनु गौको देना स्वीकार नहीं किया। इस पर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने क्रोध में आकर जमदग्निऋषि का वध कर दिया और कामधेनु गौ को अपने साथ ले जाने लगा किन्तु कामधेनु गौतत्काल कार्त्तवीर्य अर्जुन के हाथ से छूट कर स्वर्ग चली गई और कार्त्तवीर्यअर्जुन को बिना कामधेनु गौ के वापस लौटना पड़ा। यह घटना जब हुई उस समय परशुरामवहां मौजूद नहीं थे। जब परशुराम वहां आए तो उनकी माता छाती पीट-पीट कर विलाप कररही थीं। अपने पिता के आश्रम की दुर्दशा एवं शव पर 21 घाव देखकर और अपनीमाता के दुःख भरे विलाप सुन कर परशुराम जी ने इस पृथ्वी पर से क्षत्रियों को 21 बार संहार करने की शपथले ली। पिता का अन्तिम संस्कार करने के पश्‍चात परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन सेयुद्ध करके उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बारक्षत्रियों से रहित कर दिया । इस पर महर्षि बालिमिकी का कहना है कि उन्होने श्रत्रविमर्दनन करते हुए बल्कि राजविर्मदन किया। और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पांचसरोवर भर दिए। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करनेसे रोक दिया। उन्होंने 21 बार इस पृथ्वी का परिक्रमण किया जिसमें 108 शक्तिपीठ एवं तीर्थोंकी स्थापना की।
रामसे परशुराम-परशुराम के बचपन का नाम राम था, उनके नाम के साथ भी एकपौराणिक कहानी जुड़ी हुई है जो कुछ इस प्रकार से है- एक दिन गणेश भगवान पृथ्वी परभ्रमण कर रहे थे और किसी बात पर उनका राम से साथ झगड़ा हो गया। राम ने गणेश को धरतीपर पटक दिया जिससे गणेश का एक दांत टूट गया और राम ने गणेश से उनका प्रिय अस्त्र परशुछीन लिया। जब यह बातभगवान शिव को पता चली तो उन्होंने राम कोपरशुरामका नाम दे दिया. भगवानपरशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के पूर्ण ज्ञाता हैं। प्राणी मात्र का हितही उनका सर्वोपरि लक्ष्य होता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरूहैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष हैं।न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय कानिरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों कीनिरंतर सहायता एवम् रक्षा की है इसलिए लोग इन्हें कल्याणकारी भगवान के रुप में भीजाना जाता है।

लाल बिहारी लाल
लेखकवरिष्ठ साहित्यकार हैं।
lalkalamunch@rediffmail.com

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