गीतिया सखि रे हम कइसे आजु गाई

गीतिया सखि रे हम कइसे आजु गाई !

माइ छठि हे माइ, कइसे हम मनाई !!

ताल ना शबद – पद, लय कहाँ पाई !

मुढ़-मति बानी, कइसे के गोहराई !!

कहाँ सखि रे हम,शरधा फुल पाई !! !!

मधि भवरवां फुल, छत- विछत कइले !

परल जहर फल, साग बिषरस भइले !

दूषित माखन भोग, कइसे हम लगाई !!

नदिया-तलइयां दूषित, जल-पत्तर!

देहिया पवितर बा,मइल मन- अंतर !!

देव सुरुज देव, कइसे अरघ दियाई !! !!

 

  • लोकनाथ  तिवारी “अनगढ़”

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