जीएसटी : ये राह नहीं आसां

जीएसटी भारत जैसे देश के लिए जहां कई राज्य और उनकी सरकारें हों वहाँ विदेशी निवेशकों और अंतरराज्यीय व्यापार मे बहुत सी चुनौतियाँ थी, जो निश्चित तौर पर इस जीएसटी बिल से दूर होंगी। अब सम्पूर्ण भारत मे एक तरह की वस्तु पर एक ही दर का कर लगेगा जबकि पहले एक ही तरह की वस्तु पे विभिन्न राज्यों में अलग अलग कर दर थे अलग अलग परिभाषाएँ थी । पहले सीएसटी का क्रेडिट दूसरा राज्य नहीं देता था जबकि अब जीएसटी में अब किसी राज्य में भुगतान किए गए कर का क्रेडिट मिलेगा। अब ये सारी सहूलियतें मिलेंगी एक देश एक कर, एक कर एक दर होगा, सीपीआई से जुड़ी वस्तुवों का जीरो दर करना निश्चित ही जरूरत की चीजों को महंगा करने से रोकेगा, लेकिन बहुत से ऐसी दैनिंदिनी चीजें हैं जो सीपीआई से नहीं जुड़ी हैं लेकिन उसका दर बढ्ने से महंगाई का असर मालूम चलेगा।  जीएसटी अच्छा तो है लेकिन इसकी कुछ चुनौतियाँ हैं जिसे सरकार और देश को समझना पड़ेगा।

मौजूदा दौर में नोटबंदी की तरह जिस तरह से एक झटके मे जीएसटी को लागू करने की बात चल रही है वह देश के व्यापारियों को कम से कम 3 साल तक व्यावहारिक उलझनों में डालेगा। कायदे से सरकार को जीएसटी बिल पास करने के बाद कम से कम 1 साल का वक़्त कर तंत्र का हस्तांतरण  का देना चाहिए ताकि व्यापारी और सलाहकार का जो पूरा तंत्र है वो सज्ज हो सके। यहाँ सरकार को समझना चाहिए यह कर तंत्र का हस्तांतरण  सिर्फ सरकार के कर तंत्र का नहीं है, देश के करोड़ों व्यापारियों के लेखा एवं कर व्यवहार का हस्तांतरण  है। कहीं यह ऐसा न हो जाए का की गाँव से आए एक नए नए कक्षा 5 के लड़के को ग्रेजुएशन के छात्रों से भरी कक्षा में अँग्रेजी में भाषण देने को कह दिया जाय और वह भरी कक्षा में इस को कर न पाये और बेहोश हो कर वहीं गिर जाए।

सरकार को दिल्ली मुंबई पूना बेंगलुरु के चश्मे से नहीं देश के दूरस्थ क्षेत्र मे स्थित गाँव और कस्बों के चश्मे से देश को देखना चाहिए चाहे वो मणिपुर का गाँव हो या बिहार का दूरस्थ गाँव हो। ग्रामीण और कस्बाई और छोटे शहरों की जो हालत है उसके हिसाब से तो कई व्यापारी नए कर तंत्र से संगत बैठाने में अपने को कठिनाई में पाएंगे। देश मे तो अभी साक्षरता की दर 100% भी नहीं है यह अभी 74% तक ही पहुंची है, जिसमें अँग्रेजी की साक्षरता दर और उसमें से भी कम्प्युटर और इंटरनेट की साक्षरता दर तो और भी कम है ऐसे में उनसे यह अपेक्षा करना की इतना बड़ा बदलाव, वो भी जिसमें अँग्रेजी और कम्प्युटर का बोलबाला हो और कम्प्युटर चलाने के लिए बिजली और इंटरनेट का नेटवर्क आवश्यक है उसके लिए देश, देश का प्रशासन तैयार है क्या ? कई बार ऐसा हो सकता है की अंतिम तारीख के समय बिजली ही ना हो या इंटरनेट का नेटवर्क ही न हो तो ऐसी दशा में ब्याज और पेनाल्टी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा। सरकार अपनी प्रशासकीय जिम्मेदारियों को जनता पे क्यूँ लाद रही है।

आप आज भी ग्रामीण और कस्बाई और छोटे शहरों के व्यापारियों से बात करिए उन्हे आज भी ठीक तरह से वैट क्या होता है, कैसे लगता है , कैसे रिटर्न भरा जाता है नहीं पता है। भारत का 70%ग्रामीण और कमोबेश कस्बा और छोटे शहर शामिल कर लें तो करीब करीब 85% जनता वैट ठीक तरह से जानती नहीं है जीएसटी को समझना तो दूर। ग्रामीण और कस्बाई और छोटे शहरों के व्यापारी आज भी अपने परंपरागत वकील के माध्यम से अपने बिक्री के रिटर्न भरते हैं। सरकार ने इन वकीलों के प्रशिक्षण और तैयारी के लिए अभी तक कोई बड़ा इंटैन्सिव कार्यक्रम नहीं चलाये हैं और अगर चलाये भी हैं तो इन वकीलों में से बहुतों ने ट्रेनिंग अभी नहीं ली है  । सरकार के खुद के प्रचार और कार्यक्रम चालूँ है लेकिन क्या यह भारत के सभी व्यापारियों को समझा पाएगी यह असंभव है। भारत के इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया ने अपनी तरफ से बहुत से कार्यक्रम और वर्कशॉप चलाएं हैं और इसने अपने सदस्यों को इस कार्य के लिए सज्ज कर रक्खा है, लेकिन इनके सदस्य ज्यादेतर बड़े शहरों में हैं न की शेष भारत में और मौजूदा चुनतियों को देखते हुए इनकी संख्या भी कम पड़ेगी। अतः सरकार को वर्तमान में मौजूदा परंपरागत वकीलों एवं अन्य प्रैक्टिस करने वालों को इस चुनौती से सज्ज करने के लिए इंटैन्सिव वर्क शॉप चलाने चाहिए जहां सरकार चूक रही है।

पहले के कानून मे वैट बिक्री पर ही था लेकिन इस जीएसटी मे अब ब्रांच या स्टॉक ट्रान्सफर है तो उसपर भी आप को जीएसटी भरना पड़ेगा। कर तंत्र का हस्तांतरण  के वक़्त जो स्टॉक एमआरपी पे पड़ें हैं उनका टैक्स ट्रान्सफर कैसे होगा वह एक चुनौती है।

सबसे अधिक दिक्कत जो व्यापारी महसूस करेंगे वो यह है की उनके खरीद पे भुगतान किए गए जीएसटी का सेट ऑफ उनके देय जीएसटी से तब मिलेगा जब उनको माल बेचने वाला व्यापारी उस कर को पहले भर नहीं देता है और सिर्फ भरने से ही काम नहीं चलेगा जब तक की वह इस भरे गए कर को सम्मिलित करते हुए अपना जीएसटी रिटर्न नहीं भर देता है। अतः सप्लायर एंड से हुई एक चूक बेचने वाले व्यापारी को भारी पड़ने वाली है और उसके सप्लायर की एक चूक उससे ज्यादे कर भरवाने वाली है। अगर किसी के एक दो सप्लायर हैं तो परेशानी कम हैं लेकिन यदि किसी के एक से ज्यादे सप्लायर हैं तो उसे काम धंधा छोड़ के अपने सप्लायर के वैट रिटर्न पर ही लगना पड़ेगा। सरकार अपनी प्रशासकीय जिम्मेदारियों को जनता पे क्यूँ लाद रही है, यह सरकार का काम है की व्यापारियों ने वैट भरा या नहीं भरा इसकी जांच करें इसमें वह माल के खरीददार को पार्टी बना के व्यापारका चक्र क्यूँ धीमा कर रही है? व्यापारी अब अपना वैट रिटर्न देखे या घूम घूम कर अपने सप्लायर का वैट रिटर्न देखे।

हर माह 3 रिटर्न और पूरे साल में कुल मिला के 37 रिटर्न भरने पड़ेंगे। सूत्रों के मुताबिक रिटर्न के साथ बिल की कॉपी भी अटैच करनी पड़ेगी। इन सब के लिए देश का टैक्स में प्रैक्टिस करने वाले बड़े वर्ग और व्यापारी के अकाउंटेंट को प्रशिक्षित नहीं किया गया और सीए की संख्या उस मुक़ाबले में कम है।

जीएसटी एक अच्छी दवा है लेकिन इसका क्रियान्वयन बहुत ही सावधानी से और पर्याप्त समय देकर करना चाहिए, नहीं तो देश एक बार फिर लाइन में खड़ा हो जाएगा। जीएसटी बिल पूरी तरह से पास होने के बाद , सरकार की सभी तैयारियां पूर्ण होने के बाद कम से कम जनता को एक साल का वक़्त देना चाहिए ताकि जनता, जनता के वकील सीए अकाउंटेंट इसे समझ सकें और ग्राह्य कर सकें।

मुझे एक बात समझ में नहीं आती सरकार के पास इस तरह के वैकल्पिक मॉडल कई देशों डीटीएए मॉडल के रूप मे उपलब्ध था उसकी जगह यह नया और केंद्रीयकृत मॉडल क्यूँ अपनाया। मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय डीटीएए मॉडल भारत के संघीय मॉडल को ज्यादे संगत  रहता। भारत को इस डीटीएए जैसे मॉडल को लागू करने के साथ साथ एक प्रदेश मे भुगतान किए गए टैक्स का दूसरे प्रदेश मे देय कर से सेट ऑफ को मान्य करने का नियम साथ मे वस्तुवों के परिभाषा, श्रेणी और कर की दर को मानकीकरण कर देना था, इतना बड़ा ढांचागत परिवर्तन करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। देश का कर तंत्र, व्यापार तंत्र और सलाहकार तंत्र को बस थोड़ा सा ही प्रशिक्षित करना पड़ता, अब तो पूरा हुलिया बदलने जैसा है।

आशा करते हैं की देश नोटबंदी के झटके की तरह ही इसको सह लेगा और इसके सकारात्मक परिणाम जल्द से जल्द आएंगे हालांकि देश के कर इन्फ्रा एवं आम जन की तैयारियों को देख कर राह असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल दिख रही है।

 

लेखक

पंकज जायसवाल

लेखक सामाजिक आर्थिक विश्लेषक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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