ढाई आखर प्रेम का

प्रेम कहल केकरा के जाला , ई  एगो बिचारे जोग बात ह ।  प्रेम एगो अलगे चीजु ह आ आजकल  जेकरा के प्रेम कहल जा रहल  ह , उ प्रेम ना ह , उ आसक्ति ह, मोह ह । चीज होती है प्रेम । आज जेकरा के प्रेम कहल जा रहल बा  उ दोसरा के संगे अपना के जोड़ के पहिचान बनावे के एगो तरीका भर ह । एकरा के प्रेम ना कहाला , एकरा के आसक्ति भा मोह कहल जाला । बाकि आजु के नवाहा लोग एकरे के प्रेम बुझता ,जबकि एकर प्रेम से दूर दूर तक कवनो रिसता ना ह ।

प्रेम के का अरथ होला एह पर बहुत विमर्श भइल बा । एगो विमर्श के हिसाब से प्रेम भगवान के सोझा अपना के तन मन धन आउर आत्मा हर तरह से समरपन करे के नांव ह । प्रेम के तीन गो माध्यम होला – शरीर , मन  आ आत्मा । ई तीनों माध्यम सांसरिक आ आध्यात्मिक प्रेम राह मे बढ़े मे सहायक होला । बाकि ओकर सफलता संदिग्ध होले , एही से भोजपुरी के आदि कवि कबीर बाबा कहले बानी —-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.

 

अब अगर शारीरिक  प्रेम के बात करल जाव त फेर प्रेम, पियार ,मनुहार, जज़बात , चाहत, लगाव आउर ना जानि केतना सबद बाड़न स जवना से प्रेम के परिभाषित करल जाला । अलग अलग चेतना के लोग ओकरा के अलग अलग आँखि से देखेला , समझेला , बुझेला आ फेर ओकरे हिसाब से बेवहार करेला । एह मे भाई – बहिन , महतारी – बेटा भा बेटी , मरद -मेहरारू  आ हर रिसता नाता के आपसी बात के लीहल जाला । इहे प्रेम मनई के ओकरे देश , समाज आ धरम करम से जोडेला ।  भारत देश त त्योहारन के देश रहल ह , आजों ह । बिरले कवनो महिना होई जवना मे त्योहार न पड़त होखे । बाकि सभले बेसी जव ने तेवहार के जोहाला उ मदनोत्सव यानि “प्रेम के त्योहार” ह । बसंत पंचमी से शुरू होके होली तक या कतों कतो बुढ़वा मंगर तक चलेला । लहलहात फसल आ पीयर पीयर सरसों के फूल , गदराइल मंटर, पोढ़ाइल कचरी सभे के उन्मादित क देवेला । फेर लइका , जवान , बूढ़ सभ केहू एक्के लेखा बुझाला आ अपने अपने गोल मे ओकरा के गावेला , गुनगुनाला आ मनावेला । प्रकृति प्रेममय हो जाले , आम के पेंड मोजराए लागेले । सिवाने मे एगो अइसन मादक सुगंध फ़इल जाले ,जवन केकरो के मदमस्त बना देवे ले । फेर त सगरों इहे देखाला –

बगिया महकल कचनार

गोरिया  करेलीं  सिंगार

ओढ़ी पियरी खोजत दिगंत के ॥

आंगछ बसंत के ना ॥

 

बाकि एह भोजपुरिया संस्कृति मे जवन प्रेम के स्वरूप होला उ संस्कार से लबालब भरल होला । इहाँ छिछोरापन के जगह ना होला । इहाँ प्रतीक से ,आँख के भाषा से सभे कुछ कहाला ।भोजपुरिया संस्कृति एकरा से इतर एगो रसता बनवले बा , जवन समाज के संस्कारित करे मे सहायक बा । माघ महिना के शुक्ल पक्ष के पाँचवी तिथि के बसंत पंचमी कहल जाला । इ मानल जाला कि देवी सरस्वती के एही दिन आगमन भइल रहे । सरस्वती देवी के ज्ञान , विद्या , बुद्धि के देवी मानल जाला , एही से बसंत पंचमी के दिने उनकर पूजा कराल जाला । बसंत के आगमन के सूचना बसंत पंचमी के मनाला ।   बसंत ऋतु के मधुमासो काहल जाला । एह मधुमास मे खिलल धूम , टुसिआइल पेंड़, पवधा , लतरी , खिलल खिलल फूल सभेके मन के मोहे लगेला । चिरई चुरमुन चंहके लागेलन । चरो ओरी खुसी खुसी मे सभे कुछ लउके लागेला  । जब ई संस्कृति के रूप बिलाए लागेला , त कवि मन व्यथित हो जाला । देखी  डॉ अशोक द्विवेदी का कह रहल बाड़े –

 

गलत कलेण्डर के तिथि लागे
जे देखs ,बउराइल भागे
कोइलरि गइल बिदेस भँवरवा
गड़ही – तीर मगन !!

 

कवन गीत हम गाईं बसन्ती
पियरी रँगे न मन !!

 

एह घरी समाज पछिमहिया संस्कृति मे बूड़ल जा रहल बा । आपन संस्कार बिला रहल बा । एही मे एगो बाबा बेलेंटाइन बाड़े, उ त आउर लीपा पोती करे मे लागल बाड़ें । बेलेंटाइन डे के प्रकोप 7 दिन रहेला , आजु – काल्हु के नवहा एकरा के बेसबरी से जोहत रहेलन । काहें से कि एह  दिन उनका के  अपने प्रेम के  इज़हार करे के छूट मिल जाले , ई छूट के देवेला , पता नइखे । जवन बात कहे खाति उनुका लोगिन के बरिस भर हिम्मत जोड़े के पड़ेला, वैलेन्टाइन्स डे पर उ लोग बेगर कवनो झिझक के कहि देला । आउर एकरा के केहू बुरा ना माने । फरवरी के महीना मे एकरे धूम रहेला , कतहूँ  उछाह रहेला त कतो जमके ओकर बिरोधो होला । कुछ संगठन आ सरकार एकरा के प्रोत्साहित ना करे । एकरा गहराई मे जाके सोची त इहे समझ मे आवेला कि प्रेम एगो फूल के लेखा बा । पहिला बेर जब फूल जिनगी मे जगह बनावेला  त  मनई ओकरे ला फरे – फुले के कूल्हि  उताजोग करेला  जवना से कि ओकर विकास हो सके । ओहि के फूल गइला  के बाद जब हथे धरेला त बहुते धियान राखेला । एह काम मे हो रहल परेशानी ओकरा के परेशानी ना लगे काहें कि उ फूल ओकरे बदे एगो महत्व राखेला । एकरे दोसरके पहलू के देखी – मोह , जवने के आजु के नवहा पियार बुझेला लो , उ बनावटी फूल बा । बाकि ओहमे कवनो दिक्कत ना होखे बाकि जब जिनगी मे आवेला त ढेर दिक्कतो आ बेचैनी संगही लेले आवेला । जवन दुख के अलावा आउर कुछो ना देला । जइसही ढेर बीपत बढ़े लागेले , लोग बनावटी फूल से किनारा क लेवेला । जवन अक्सरहा आज के समाज मे लउकिए जाला । मोह बस दैहिक लगाव आ ओकर प्राप्ति पर टंगाइल रहेला । शुलभ भइला के बाद ओकर आकर्षण ना बचे आउर  एक दिन खतम हो जाला ।  आज के इंसानी प्रेम खाली एकाकार होखे आ फेर आनंद के साधन के रूप मे इस्तेमाल करे के कहानी बन चुकल बा । जवना के शारीरिक प्रेम से अधिका ना कहल जा सकेला । जवन आज के समाज आ संस्कृति दूनों खातिर घातक बा । एगो पुरान कहावत बा – “दूर के ढ़ोल नीमन लागेले” , उहे हाल एह पछिमहिया संस्कृति के बाटे । एकरा के लग्गे जे गइल , आपन सगरी संस्कार आउर संस्कृति भुला के खाली अपनही बारे मे सोचे लागेला ।

पछिमहिया संस्कृति अइसन संस्कृति हे , जवने मे भोग – विलास मे सनाइल लोग मनई से जानवर बनि जाला । आदर सन्मान , रिसता नाता के कवनो जगह ना बचेला । इजत , शरम , हया बिला जाले । बड़ बूढ़ के ई संस्कृति कवनो जगह ना देवेले । ओकर असर आजु के समाज मे सोझा लउकत बाटे, बृद्ध आश्रम ओही के परिणाम ह । धनाढ्य मनई अपने लइकन के नोह छोह खाति तरस रहल बाड़े आ कबो कबों  लड़िका अपने माई बाबू के बहरिया देत बाड़े , जेकरे चलते बूढ़ माई बाप के   भीख मांगे के पड़ जात बा । सोच जब अपनही मे अझुरा जाले , त महतारी के कंकाल भेंटाला । जब एह पछिमहिया संस्कृति के भीतरी झांकब , घिन्न आवे लागी ।

हमनी के संस्कृति पछिमहिया संस्कृति  के जाल मे अइसे अझुराइल जा रहल बानी सन  कि आपन कूल्हे संस्कृति आ संस्कार गवे गवे बिलाइल जा रहल बा । रीति आउर परंपरा भार लेखा बुझाता । आपन पलिवार पहाड़ लेखा लउकत बा आ रिसता बीपत लेखा । अइसने मे आज जरूरत बाटे अपने संस्कार आ संस्कृति के जोगावे के , बचावे के आ फेर से अपनावे के । तबे फेर से भारत के परंपरा मे, संस्कृति मे उहे पहिले वाली सुगंध लउटी , नेह छोह आ आदर सनमान , एक दोसरा खाति आटे जूरे के भाव हिया मे हिलोर मारी ।  फेर से इहवाँ मधुमास आई ,चइता , कजरी, होरी , रोपनी , सोहनी , लवनी, सोहर , झूमर , जँतसार  के मंगल गीत गूँजी । त फेर से फागुन मे ई केहू ना कही –

बिहंसे ना बिहान , नाही हुलसेला चान

सखी फगुनवाँ मे ॥

अलसाइल बा जवान ॥ सखी ……

 

चंहके ना सिवान / नाही मंहके बगइचा

नाही गवाला फगुवा / बिछे ना गलइचा

भुलाइल जग सुर तान ॥ सखी ……

 

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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