त्यौहार और परिवार

अपना देश त्योहारों का देश है । यहाँ जितनी जन जातियां है उनसे ज्यादा त्यौहार मनाये जाते है । पर जहाँ तक मैं समझी हूँ त्यौहार अपने देवी देवताओं के काल से चले आ रहे हैं । या उनसे सम्बंधित कोई लीला पर निर्भर है हर त्यौहार । या किसी महान सन्त के जन्मदिन को एक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है । कबीले वालों की अपनी सोच अपनी धारणायें होती है । कुदरत को देवता मान कुदरती चीज़ो की भी कई लोग पूजा अर्चना करते है । त्योहारों की शुरुआत जब से हुई होगी निश्चिन्त ही लोगों के लिए नयी सोच की बुनियाद रही होगी और किसी भी नयी चीज़ की शुरुआत प्रेम , उत्साह उमंग से हुई होगी । धीरे धीरे त्यौहार संस्कृति के प्रतिक बन घरों में बसने लगे होंगे और परम्पराओं को चोला पहना दिया होगा । त्यौहार को मनाने के उद्देश्यों के बारे में गर सोचें तो यह लगता है हर त्यौहार लोगों को एकजूट करने के लिए बने हैं । लोग इक्कट्ठे हो कर एक जगह एकत्रित हो इसे मनाये और एक अच्छी सुसज्जित संस्कृति की झलक दिखाई दे । समय के साथ परिवर्तिन होता चला आया है । कुछ त्यौहार सड़कों पर मनाये जा रहे है , पंडाल लगते है , डी जे लगता है सामूहिक भीड़ तो इक्कठी हो रही पर क्या ये वही त्यौहार है जिसकी कभी शुरुआत हुई थी क्या इनका मक़सद वही है जो कभी रहा होगा ? ये अपने आप में मेरे लिए एक सवाल है । हर धर्म की अपनी परम्परा , अपनी सोच , अपनी मान्यताएं हर घर में उसको मनाने के तरीके होते है । मिठाई और अन्य खाद्य सामग्री भौगोलिक और निजी पसंद पर निर्भर करती है । अब यह सवाल उठता है कि त्यौहार परिवार को एक करता है की नहीं ! इसके लिए मुझे लगता है पहले तो एक परिवार की परिभाषा को समझा जाये । क्या सिर्फ एक छत के नीचे रहने वालों को परिवार मान लिया जाये ? गर ये मान लिया जाये तो अब वो उत्साह और उमंग क्या हम मेहसूस करते है जो पहले हम किया करते थे । कहाँ फर्क आया हैं । गाँवो में , कबीलों में , जन जातियों में जहाँ शहरी करण नहीं हुआ है उनके उत्साह में और हम शहर के लोगों के बीच में उत्साह और त्यौहार को मनाने का तरीका भले अलग हो सकता है पर उत्साह ! अब त्यौहार को मनाना लकीर से फ़क़ीर की श्रेणी में आता जा रहा है । ऐसा क्यों ? जब एक सोच से , निर्मल मन से , स्वच्छ विचारों से त्योहारों को मनाया जाये तो शायद यही सच्चा त्यौहार होगा । त्यौहार को हम एक धागा मान सकते है , अब माला बनाने के लिए हमें फूलों जी जरूरत पड़ेगी , परिवार का हर एक सदस्य एक फूल होता है , घर की औरतों का दायित्व है कि एक एक कर फूल माला में पिरोये जाये और घर के मुखिया का दायित्व है कि माला की गठान बांधे । तभी यह माला तैयार होगी पूजन में ईश्वर को चढ़ाने के लिए । ये माला , यह फूल कांटे सभी तो प्रतिक होते है । इस दृष्टिकोण से लें तो त्यौहार परिवार को बांधे रखता है । आज कल की भाग दौड़ की ज़िन्दगी में त्यौहार ही तो हैं जब बाहर रहने वालों को घर की याद आ जाती है । बच्चों को खाने पीने का लालच होता है । इसके माने त्यौहार को मनाने के उदेश्य भी बदल गए हैं । कितनी बातें है जो संस्कृति हमे सिखाती है त्यौहार हमे सिखाते हैं । मेरा मानना है कि त्यौहार को मनाने में परिवार मन से साथ हो तो आनंद ही आता है और किसी भी वजह से गर एक सदस्य को भी गर यह लगे कि क्या है त्यौहार तो आये दिन आते रहते है , हम कितना ही कह ले पर वो आनंद नहीं आ पाता ।

  • कल्पना भट्ट

 

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