दमदार भोजपुरीया 2017

 कुलदीप श्रीवास्तव@bhojpuripanchayat.in दमदार भोजपुरिया! जी हाँ। भोजपुरिया माटी की एक अलग ही पहचान रही है। इस मिट्टी में वो ताकत है, वो जज्बा है, मानवता की वो खुशबू है, जीवन को समझने की वो अद्भुत कला है जो भारत ही क्या विश्व को ज्ञान के पथ पर, विकास के पथ पर, शांति के पथ पर अग्रसर करने में महती भूमिका निभाने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान से, सुख-शांति-समृद्धि से विश्व को समृद्ध करने में सदा-सदा ही अथक, अविस्मरणीय, अनूठे प्रयास की
भागीरथी बहाई है। जी हाँ, मेरी इस समझ, मेरी इस बात की गंभीरता, सच्चाई की आप खिल्ली उड़ा सकते हैं और कह सकते हैं कि आप उसी भोजपुरिया माटी की बात तो कर रहे हैं न, जो आज भी पिछड़े क्षेत्र के रूप में अपनी पहचान को समेटे हुए है। महानुभाव, आपकी सोच कुछ हद तक सही हो सकती है पर शायद आपको यह भी पता हो कि कितने ही विश्वस्तरीय नेता, अभिनेता, संत, मौलवी, पूँजीपति इसी मिट्टी की उपज हैं। इसी मिट्टी में पले-बढ़े और देश क्या, विश्व के लिए पथ-प्रदर्शक बने। जब व्यक्ति में जीवन की समझ आ जाती है, इंसानियत की बात आ जाती है तो उसे अपना काम दूसरे का भला ज्यादे प्यारा लगने लगता है और शायद बाह्य रूप से आपको जो इस मिट्टी का पिछड़ापन दिख रहा है न, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है। एक छोटी पर महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हूँ। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र बाबू चाहे होते तो आज भोजपुरी जैसी समृद्ध भाषा को बोली बनकर नहीं रहना पड़ता, इसके लिए माँग उठाने की जरूरत नहीं पड़ती पर इस महानुभाव, भोजपुरिया लाल को उस समय की परिस्थिति के अनुसार, इंसानियत सोच के अनुसार काम करना था, मात्र किसी एक क्षेत्र, भाषा का नहीं, बल्कि पूरे देश, सभी भाषाओं आदि को साथ लेकर चलना था। ऐसे महानुभावों के लिए अपना और अपने सदा गौण होते हैं, क्योंकि ये लोग तो सत्य, धर्म, ईमानदारी के सच्चे पुजारी होते हैं और जीवन की समझ भी तो ऐसे ही लोगों को होती है। जो आनंद दूसरों को सुख देने में, प्रसन्न करने में है, वह सिर्फ और सिर्फ अपने लिए करने में कहाँ? भोजपुरिया माटी की एक बहुत बड़ी विशेषता यह भी है कि इसने केवल देना जाना है, अपने तंगहाली में भी रहकर दूसरों को समृद्ध करना जाना है, और शायद धर्म, जीवन दर्शन का मूल तत्व भी यही है। ईमानदारी, कर्मठता इस मिट्टी की पहचान है।
यह पारंपरिक भोजपुरिया माटी, भोजपुरिया समाज आज भी अपनी
सतरंगी कर्मठता, जुझारूपन, ईमानदारी, ज्ञान, सहिष्णुता, दया और इंसानियत के बल पर हर तरफ अपने जलवे बिखेर रहा है।
भोजपुरी सांस्कृतिक राजधानी, जी हाँ,
मोदीजी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी यानी बनारस, काशी की ही बात कर लें, आज भी यह पारंपरिक धर्म-सांस्कृतिक नगरी राष्ट्र की केंद्रबिंदु बनी हुई है। आज भी विश्व के अनेकानेक देश भोजपुरिया नेतृत्व में विकास, शांति, समृद्धि के पथ पर अग्रसर हैं। अगर सहनशीलता की बात हो तो भोजपुरिया माटी नमनीय है। जहाँ देशभर में किसानों आदि की आत्महत्या की बात हो रही हो, ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित भोजपुरिया
अन्नदाता आह भी नहीं भरता और अपने दरवाजे पर आए अतिथि को नून-रोटी ही सही,
प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करता है। अगर जीवन जीने की सच्ची समझ की बात हो तो इसमें भोजपुरियों का कोई सानी न रहा है, न होगा।
भारतीय ज्ञान-परंपरा ने पूरे अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी अलग
पहचान बनाई है। भारतीयों की तर्क-शक्ति के आगे पूरी दुनियानतमस्तक है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से भारतीय ज्ञान शक्ति व श्रम-शक्ति की बात होती है, उसी तरह भारतीय परिप्रेक्ष्य में बिहार की चर्चा होती है। बिहार की चर्चा होते ही सबसे पहले जिस भाषा-संस्कार-संस्कृति पर नजर जाती है, वह है ‘भोजपुरी’। वैसे तो बिहार में मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका भी बोली जाती हैं और इन सभी भाषाओं व इसके बोलने वालों की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। लेकिन बिहार की पहचान को दर्शाने के लिए किसी एक भाषा का चुनाव करना हो तो वह निश्चित रूप से भोजपुरी ही है। बाकी भाषाओं व बोलियों की तुलना में भोजपुरी बोलने-समझने वालों की संख्या वैश्विक स्तर पर ज्यादा है। आज वैश्विक स्तर पर भोजपुरियों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी
दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। यह
उपस्थिति यूं ही नहीं है, इसके पीछे एक बहुत बड़ी संघर्ष-कथा है। इतिहास के आइने में भोजपुरी भाषी भू-भाग को देखने पर मालूम चलता है कि यहां पर ज्ञान का अकूत भंडार रहा है लेकिन दूसरी तरफ भौतिकवादी युग के साथ तारतम्य बिठाने में भोजपुरी माटी के पूर्वज उतने सफल नहीं हो पाए जितने दूसरे क्षेत्रों के लोग हुए। इसका मुख्य कारण यह रहा कि भोजपुरिया लोग तीन-पांच की भाषा कम जानते हैं, साफ-सुथरा जीवन जीने में विश्वास रखते हैं। सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते हैं। आध्यात्म व धर्म के दायरे में ज्यादा मजबूती के साथ बंधे रहे हैं। पूर्वजों से मिले इस संस्कार ने कालांतर में आकर भोजपुरियों को इस कदर गढ़ा कि वो जहां भी गए अपनी ईमानदारी, मेहनत व कर्मठता की बदौलत अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। उनकी इस सफलता ने दूसरों के मन में जलन के भाव को जन्म दिया, जिसे गाहे-बगाहे मुंबई-असम में भोजपुरियों के खिलाफ घटी घटनाओं के रूप में हम देख सकते हैं।
दरअसल, भोजपुरी एक भाषा ही नहीं बल्कि एक संस्कृति है, संस्कार है। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में मुख्य रूप से लिखी-पढ़ी व बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा का विस्तार आज देश की चैहद्दी को पार कर चुका है। माॅरीशस, फिजी, यूगांडा, सूरीनाम सहित दुनिया के तमाम देशों में
भोजपुरी प्रमुखता के साथ बोली जा रही है। दूसरे संदर्भ में बात करे तो दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां पर ‘का हाल बा’ की गुंज नहीं गुंजती हो। दरअसल, सच्चाई यह है कि भोजपुरी भाषियों का चरित्र इतना कर्मठ व कर्मशील रहा है कि वे प्रत्येक परिस्थिति में अपनी सार्थक उपस्थिति को दर्ज करा देते हैं।
मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। देश की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा मुंबई के पास है। क्या बिहारी दिमाग को, खासतौर से भोजपुरिया दिमाग व श्रम शक्ति को मुंबई से बाहर कर के मुंबई की वर्तमान स्थिति की परिकल्पना की जा सकती है! शायद नहीं। मुंबई में इनकम टैक्स विभाग से लेकर छोटे-बड़े सभी कार्यों में भोजपुरी भाषी दमदार तरीके से श्रमदान करते हुए मिल जायेंगे।
राजनीतिक रूप से भी आज मुंबई में भोजपुरिया इतने मजबूत हो चुके हैं कि वहां की
राजनीतिक गणित को बनाने-बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं। भले ही ठाकरे जैसे कुछ लोग गिदड़-भभकी दें, लेकिन यह भोजपुरियों का दमदार वजूद ही है कि वे खुंटा गाड़कर मुंबई की सियासत में भी अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। मुंबई, सिनेमा के लिए जानी जाती है, भोजपुरियों ने अपनी प्रतिभा का बेहतरीन उदाहरण यहां भी दिया है। शत्रुध्न सिन्हा से लेकर मनोज बाजपेयी तक तमाम कलाकारों ने भोजपुरिया मिट्टी को गरिमा प्रदान की है।
इसी तरह दिल्ली में भी भोजपुरिया लोगों ने अपनी अलग
पहचान बनाई है। सड़क से लेकर संसद तक भोजपुरियों की एक लंबी फेहरिस्त है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने सत्ता के गलियारों में जिस भोजपुरियां संस्कार की नींव डाली थी, उसकी गुंज आज भी राष्ट्रपति भवन में सुनाई देती है।
दिल्ली की तरह ही कोलकाता में भी भोजपुरियां श्रम ने वहां के चटकल व्यवसाय को बुलंदी पर पहुंचाया था और आज भी वहां पर भोजपुरियों की दमदार उपस्थिति है। दक्षिण
भारत में भी भोजपुरियों ने जाकर अपनी विशिष्ट
पहचान बनाई है। यदि बंगलरू की बात करें तो वहां के आईटी सेक्टर में भी ‘का हाल बा’ बोलने वालों की संख्या कम नहीं है।
सभी बातों का सार यह है कि भोजपुरियों ने अपनी कार्य-कौशलता के बल पर देश में ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर ज्ञान-विज्ञान-व्यवसाय,
साहित्य, सिनेमा सहित प्रत्येक क्षेत्र में अपनी
दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। उम्मीद करता हँू कि हम भोजपुरिया अपनी मानवीय तासीर को ऐसे ही आगे बढ़ाते रहेंगे और देश-दुनिया में भोजपुरी माटी का बुलंद पताका फहराते रहेंगे।
भोजपुरी पंचायत अपने कर्मपथ पर साकारात्मकता से आगे बढ़ते हुए,
भोजपुरी समाज, संस्कृति, भाषा को नमन करते हुए इन्हें विश्व स्तर पर प्रचारित, प्रसारित करने में महती भूमिका निभाते आ रहा है। भोजपुरी समाज, संस्कृति, भाषा की मिठास से अभोजपुरी पाठकों को भी
परिचित कराते आ रहा है। इतना ही नहीं यह समय-समय पर कुछ ऐसी सामयिक बातों, मुद्दों, विचारों को उठा-उठाकर अपने पाठकों के सामने रखता है, जो पाठकों में चिंतन की पराकाष्ठा का संचार कर देती हैं। इसी क्रम में यह पत्रिका अपने भोजपुरिया कर्मठ लालों को विश्व के समक्ष नमन करती रहती है ताकि उन्हें विश्व जाने तथा साथ ही इन भोजपुरिया माटी के लालों से प्रभावित होकर अन्य भोजपुरिया, अभोजपुरिया भी अच्छे,
साकारात्मक कार्यों से देश, समाज, विश्व का कल्याण करने के लिए आगे आएं और साथ ही अपना, अपने समाज, संस्कृति आदि का नाम भी रोशन करें। पहला और दूसरा “दमदार भोजपुरिया” अंकको पाठकों का असीम प्यार मिला। और अब बारी है, तीसरे “दमदार भोजपुरिया” अंक को आपके सामने प्रस्तुत करने का। इस विषय के पीछे मंशा यह होती है कि श्रम, ज्ञान के पुजारी भोजपुरियों को एक मंच पर लाया जाए और पाठकों से इनका परिचय कराया जाए।
“दमदार भोजपुरिया” के इस तीसरे कड़ी के लिए देश-विदेश के हमारे सम्मानित
पाठकों से साथ ही अन्य लोगों ने भी 400 से भी ज्यादा नाम सुझाए। यह सूची बहुत ही विस्तृत थी क्योंकि हमें इनमें से मात्र
50 दमदार भोजपुरियों का चयन करना था। कोई भी प्रतिभागी किसी से कम नहीं था। इस
स्थिति में हमने आॅनलाइन और आॅफलाइन प्रसिद्धि ग्राफ को भी ध्यान में रखा। फिर क्या था, काफी विचार-विमर्श के बाद उन चुनिंदे 50 नामों पर सहमति बनी, जिसे इस अंक में आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। जी हाँ, वर्ष 2016 में अपने कर्मों आदि से भारत के साथ ही विश्व पटल पर छाए हुए ‘दमदार भोजपुरिया – 2017’ से समृद्ध अंक आप लोगों के हाथों में देते हुए अति प्रसन्नता एवं गर्व का अनुभव हो रहा है। ‘दमदार भोजपुरिया’ का यह अंक भोजपुरिया सपूतों की मेहनत-लगन व जुनून की
कहानी है। ऐसे सपूत, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में भोजपुरिया पताका को विश्व पटल पर लहराया है।
इस अंक में कुछ नए भोजपुरिया लालों के नाम जुड़े हैं तो पिछली बार आए कुछ नाम इस सूची से बाहर हो गए हैं। जिन भोजपुरियो का नाम नहीं आ पाया है, वे यह न समझें कि उनका योगदान भोजपुरी माटी के लिए कम है। हम चाहते थे कि उभरते हुए, अपने कर्मों से भोजपुरिया माटी को गौरवान्वित करने वाले नाम भी चुने जाएं ताकि समाज में, पाठकों में यह संदेश जाए कि भोजपुरिया माटी के लाल थमने वाले नहीं हैं। अगले वर्ष भी ऐसी ही सूची हम जारी करते रहेंगे। संभव है तब आपका नाम इस सूची में हो। बस आपको अपने क्षेत्र में बेहतर से बेहतर कार्य करना है। हमारी टीम की नजर आपके कार्यों पर लगातार बनी रहेगी। इस अंक में तमाम मित्रों ने अपने बहुमूल्य समय व सुझाव दिया है। उन सभी को ‘भोजपुरी पंचायत’ परिवार साधुवाद देता है।

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