दुर्गा माई से हथजोरिया

मति, गतिहीन बानीं, बुधिओ, बिबेक न बा,

तबो हाथ जोरि ठाढ़ बानीं अगुवानी के.

दरद, अभाव, पीर महलो का होला, बाकी

सबका से ढेर बाटे टुटही पलानी के.

मनवाँ के अंगना नयनजल लिपनीं, त

दियना अँजोर करे तनवाँ- दलानी के.

आव$, आव$, आव$ अब देर ना लगाव$, हम

राह ताकतानीं, गुनखानी महारानी के.

 

नाहीं कुछ चाह बा कि दोसरा के हक छीनि,

हमरे दुआर प बहा दीं उपरवछा.

हमरा के पगड़ी त दोसरो के दे दीं एगो,

लाल रंग रंगल लहरदार गमछा.

सबकर आन, बान, सान, मान रोज बढ़े,

सबबिधि काज नित हो इहाँ अच्छा-अच्छा.

रउएँ प आस- बिसवास बाटे दुनियाँ के,

रउएँ भरेनीं नित थइली आ खोंइछा.

 

लाल रंग देवल बनल देबी दुरूगा के,

लाल धजा लहर- लहर लहरात बा.

लाल फूल, लाल सूल, चुनरी चटक लाल,

लाल रंग सेनूरा से मंगिया भरात बा.

लाल चूड़ी, लाल बिंदी, आँखि लाल देखते में,

लंपट, लबार, लतखोर लो डेरात बा.

लाल के अरज सुनि गोदिया उठावे माई,

धनि- धनि भागि कहि लाल अगरात बा.

 

बघवा सवार कुसमांडा भवानी मइया,

जगमग जोति से जगत उजियार बा.

हँसला से तहरा सिरिजना जगत के ह,

सुरूजमंडल बीच महिमा अपार बा.

आठ भुज देखिके परइलें पिचास सब,

गदा, तिरसूल, भाला, हाथ तलवार बा.

कोंहड़ा के भोग ले के बेरि- बेरि बिनवत,

बचवा तोहार रोइ करत गोहार बा.

 

दुख देखि पूतवा के गोद में उठाइ लेली,

करूना के, ममता के, समता के धाम जी.

सुभ जोति छिटेली, जगत चमकाइ देली,

करि देली रतिया में टहटह घाम जी.

बघवा की पीठिया लगल पदमासन बा,

देखत- सुनत जग पावे बिसराम जी.

सादर झुकाइ माँथ, जोरले दुनउ हाथ,

भरि आँखि लोर ले जपीले तोर नाम जी.

 

सुघर, सुनर, समभाव, सदभावना के,

कन-कन ब्रह्म से लगाववाला देस ह.

माई के चरनधूरि माँथ पे चढ़ावेवाला,

दृढ़सक्ति, कोमल सुभाववाला देस ह.

हाथवा कमल, तलवार लिए माई इहाँ,

केहू से ना केहू के दुराववाला देस ह.

अभय करेली, वरदान, ज्ञान, मान देली,

कातयायनी के परभाववाला देस ह.

 

बेरा भा कुबेरा, गदबेरा भा सबेरा होखे,

टेर सुनि देर ना लगावे मोरी मइया.

लम्पट, लबार, लतखोर आ लफंगन के,

देली लतिआइ, सुधिआवे मोरी मइया.

कालरात्रि, आँखि लाल, साँस में महाअगिन,

तबो पूत गोदिया उठावे मोरी मइया.

तेजिके गुमान, अभिमान, सान, सब ज्ञान,

चरन परे जे, अपनावे मोरी मइया.

 

धरमे के नाँव लेके मनई कटात इहाँ,

जतिया का चलते होखेला महाभारत.

ममता आ करूना के ताख पर राखि लोग,

सृस्टि के आधार धिया गरभे में मारत.

सुनर, सुसील बहू, थोर जो दहेज लावे,

आदिसक्ति पूजि, आदिसक्तिए के मारत.

एकबेरि ताकि, मति फेरतु ए महागौरी,

भक्तजन टकटक रहिया निहारत.

 

नया पल, नया दिन, देस आ प्रदेस नया,

नया भाव, नया चाव, नवका बिचार से.

बुद्धि आ बिबेक, बल, पौरूस अथाह नया,

नया होस, नया जोस, रोस दमदार से.

सुघर, सुगम राह सरपट दउरत,

भारत महान् बने एह तेवहार से.

देसभक्ति ना अथोर, दसो दिसि गूँजत हो,

सिद्धिदात्री माई! तोरी जय जयकार से.

 

  • सुभाष पाण्डेय

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