नारीसक्ति, संघर्ष और सफलता की मिशाल ‘लीला सिन्हा’

जन्म के साथ ही मैं माँ बाप के लिए एक श्राप बन गयी थी। क्योकि हम चार बहने है जिसमे मैं सबसे छोटी हूँ। मेरे साथ मेरा एक भाई जो की पैदा होते ही मर गया था और मैं जिंदा पैदा हुई, इसलिए सबको लगता है कि मंै पैदा होते ही अपने भाई को खा गयी, पर इसमे मेरा कसूर क्या था? जब मै थोड़ी बड़ी हुई तो पहली बार गाँव आयी, जो रोहतास जिला मे पड़ता है। वहाँ हमारे यहा काम करने वाली दाई हमे देखते ही बोल पड़ी, ये राक्षस आ गयी अपने भाई को खाकर। तब मै इन शब्दो को समझ नहीं पाती थी कि वो क्या कह रही है। मेरी एक बड़ी बहन थी जो हमेशा मेरा ख्याल रखती थी, वही बताई की हमलोगो का एक भाई था जो अब नहीं रहा इसलिए वो ऐसा कहती है।
मेरी माँ बहुत ही पुराने विचारो की थी, उसे बहुत दुख था कि मेरा कोई लड़का क्यू नहीं है, पर इसमंे भी मेरा क्या कसूर? इस तरह लोगो के ताने तथा लांछन सुनते सुनते दिन बीतते गए और हम बड़े होते गए। मेरी बड़ी बहन जो माँ की जगह लेती थी, मेरी पढ़ाई लिखाई का सारा बोझ उसी ने उठा रखा था। मै धनबाद में अभय सुन्दरी हाॅस्टल मे चली गयी, वहां से लौटने के बाद 1953 में मेरी शादी हो गयी। शादी क्या एक समझौता हुआ पिताजी की ईच्छा थी कि किसी तरह शादी करके चले जाना है।
शादी के आठ महीने बाद ही पिताजी गुजर गये, वो भी मेरा दुर्भागय ही था। सबों ने कहा की ऐसी मनहूस है कि शादी के बाद बाप को भी खा गयी। खैर ये तो मेरी नियति बन गयी। जिसे जो कहना था कह रहा था। शादी के तीन-चार साल तक कोई संतान नहीं हुआ। ये भी मेरा
दुर्भाग्य था। लोगो ने फिर कहना शुरू कर दिया की इसे गोद ले लो तो उसे गोद ले लो। पर भगवान को शायद लगा होगा की अब इसे और कितना दुख दे। मुझे एक लड़का हुआ उसके बाद तीन लड़किया पैदा हुई। एक लड़की बहुत दुख सहकर इस दुनिया से चली गयी, अभी दो बेटियाँ मेरे पास है।
मेरी शादी जिस घर मे हुई मैं वर्णन नहीं कर सकती, वहां इन्सान नहीं रहते थे, मुझे उस घर मंे रहने के लिए कितना मेहनत और संघर्ष करना पड़ा मंै लिख नहीं सकती। बच्चे थोड़ें बड़े हुए उन्हें अच्छी शिक्षा मिले इसलिए मैंने अलग रहने का फैसला किया। मेरे पति ने यहां आने पर मेरे बेटे का नाम एक ऐसे स्कूल मे लिखवाया जहा सिर्फ एक ही बच्चा था। उस दिन मेरे अन्दर की औरत जागी, और मैंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी मिला नहीं मिला पर मैं अपने बच्चे को अपनी जिन्दगी नहीं जीने दूँगी। फिर मैंने दूसरे जगह उसका नाम लिखवाया। बच्चो की पढ़ाई शुरू हुई। बेटा पढ़ने मंे होसियार था तथा पढ़ लिख कर पायलट बनना चाहता था। मैंने भी उसे उसके सपने साकार करने के लिए भरपूर सहयोग दिया तथा कदम-कदम पर उसे प्रोत्साहित किया। मेरे घरवाले कुछ कहते हो या नहीं इसका मुझे कोई परवाह नहीं, पर मेरे पति मुझसे कहते थे कि इन्दिरा गांधी बनी है, इनका बेटा पायलट बनेगा, लिखकर देता हूँ अगर तुमहरा बेटा पायलट बन जाएगा तो मै अपना नाम बदल दूंगा।
पर ईश्वर की मर्जी मेरा बेटा पायलट बन गया और आज अपने पिता को देश विदेश सब जगह घुमाता है, आज मेरे पति अपने बेटे पर नाज करते हैं पर वो पुराने दिन भूल गए कि कैसे मैंने हर परिस्थितियांे से लड़ कर आज अपने बेटे को इस मुकाम पर पहुचाया। उन्हे आज अपने बारे मे भी ये एहसास नहीं होगा की खुद उन्होंने अपने बेटे के बारे मे क्या कहा और क्या किया है। मैं तो दुनिया के हर माँ से यही कहूँगी कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए, उन्हे कुछ बनाने के लिए, ईश्वर से भी लड़ांे, पर कभी हार मत मानना। आखिर एक माँ के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात और कुछ नहीं हो सकती कि उसका बेटा अपनी जिन्दगी मंे सफलता की सीढ़िया चढ़ता जाए। मेरे लिए दुनिया का ऐसा कोई सुख नहीं है जो मेरे बेटे ने मुझे नहीं दिया हो, बिना मांगे हर चीज मेरे लिए लाता है। मेरी एक बेटी भी पायलट बन चुकी है, छोटी को भी तैयारी करा रहा है। ये सब मेरे बेटे का देन है। अब तो मै थक चुकी हूँ, पर बेटे के हर फैसले मंे मैं उसके साथ हूँ लीला सिन्हा।

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