निनानबे के चक्कर

निनानबे के चक्कर। सुनले बानी की ना? अरे जरूर सुनले होखबि। सुनलहीं होखबि। सुनलहीं का, रउओं कहत होखबि की फलनवा निनानबे की चक्कर में पड़ी गइल बा। अउरी हाँ जे पड़ी गइल ए निनानवे की चक्कर में ओकर भूखी-पियासी मरी जाला। आराम ओकरा के हराम लागेला अउरी सुतले के उ बेमारी समझेला। अरे एतने ना, दिन-रात, साँझि-बिहान बस निनाबे के सव बनवले में लागल रहेला। इहां सव के मतलब सौ से बा, सव (मिरतक) से ना पर साँच कहीं त इ निनाबे सौ ना सवे बना देला। मनई के जीवन के सुख-चैन छिन लेला। मनई के आपन कवनो औतित्ते ना रहि जाला। उ त बस निनाबे की चक्कर में सौ करे खातिर निनाबे अउर सौ की बीच में अँटकि के रहि जाला। दिन-रात हाय पइसा, हाय पइसा के जप लगा देला इ निनाबे के चक्कर। खैर अब हम बात के जेयादे ना घुमावत रउआँ सब के निनाबे पर ले के आ जातानी।

का हS इ निनानबे के चक्कर?… कबनेंगा लोग निनानबे की चक्कर में पड़ीं जाला। काहें लोग जान-बिझि के भी ए निनाबे की चक्कर में परेला। जरूर कवनो-ना-कवनो न छूटे वाला आकर्सन बा एकरी पीछे। ए निनाबे पर भाखन देहले से अच्छा बा की एके एगो कहानी की माध्यम से समझि लेहल जाव। रउआँ का कहतानी? अरे अब रउआँ का कहतानी बकबकात हम बानी त हमरे कुछ कहे के परी, त सुनीं निनाबे की चक्कर के कहानी।

एगो गाँव में चिखुरी नाव के एगो साहू रहत रहे। उS एक नंबर के मक्खीजूस रहे, अरे महा कंजूस रहे उ। अरे भाई नोटियन कुली के उ एँगा गिने की उ लुगदी हो जाँ कुली। गाँव की मनई लोगन के उS सुधी पर पइसा दे। ओकरी बगलिए में एगो रमायन नाव की मनई के घर रहे। रमायन तनी गरीबाह रहे। ओकरा पइसा घटे तS चिखुरी से ले लेहल करे। जब चिखुरी की घरे कवनो मेहमान आवे तS ओके छूँछ पानी पिए के मिले अउरी चिखुरी कुछु उलटा-पुलटा कS के ओके भगा देहल करें। अरे भाई निनाबे के जवन चक्कर धे लेले रहे उनका। जबकि रमायन की घरे कवनो मेहमान आवे तS ओकर बहुत खातिरदारी होखे। खाना-ओना खिआवल जाव। इहां तक ले की करज-पताई खोजी के भी रमायन अपनी बलभर आपन इज्जत ढाँपें। ओन्ने चिखुरी के त अलगहीं हाल रहे। अरे इहाँ तक की उ सबेरे-सबेरे उठी के अपनी मलिकाइन की संघे रमायन की घरे चली जाँ अउरी चाय-वोय पियले की बादे अपनी घरे लौटें। चिखुरी की घरे दाली-दही-तिउना कबो महीना-महीना तक नसीब नाहीं होखे जबकि रमायन की घरे एक-दू जूनी आँतर देके दाली-तिउना आदी बनिए जा। अब देखीं इ निनाबे के चक्कर के खेला की रही के भी ना रहेला मनई की पास, मिसते-मिसत में उ चलि जाला भगवान की पास।

एक दिन चिखुरी के मलिकाइन चिखुरी से कहली की रमायन की घरे पइसा के कमी बा तबो खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता अच्छा बा अउरी हमनी जान के पइसा के कवनो कमी नइखे तबो खइले-पियले-पहिनले में केतना चिरकुटई बा। ए पर चिखुरी कहने की तोहरा मालूम नइखे। हमरा निनाबे के चक्कर धइले बा अउर रमायन के अबे निनानबे के चक्कर नइखे धइले। जब उनके निनानबे के चक्कर लागी जाई तS खाइल-पियल, पहिरल सब भुला जाई उनका। उ हो हमरिए तरे मिसिआवे लगिहें अउर निनाबे के सौ बनवले की चक्कर में हमरी राह पर चलि निकलिहें। ए पर चिखुरी के मलिकाइन कहली की इ निनानबे के चक्कर का होला? तनी हमहुँ के बताईं ना। चिखुरी कहने की बतावत ना, देखावतानी।

रातीखान चिखुरी का कइने की एकहक के निनानबे को सिक्का एगो गठरी में बाँधी के, अपनी मलिकाइन की साथे जा के, धीरे से रमायन की घरवा में फेंकी देहने। जब सबेरे रमायन अउरी रमायनबS सुती के उठल लोग तS उ पइसा के गठरी पावल लोग। रमायन अउरी रमायनबS जलदी-जलदी उS गठरी खोली के लागल लो गिने। एक बेर नाहीं कई बेर गिनल लोग। गिनत-गिनत पसीना छूटि गइल, दुनु जाने के हाथ पिराए लागल तबो जर जमा निनानबेगो रुपयवे रहे। बार-बार गिने लोग की सायद ए बेरी सौ हो जाई पर निनाबे से तिलभर ना बड़े। दुनु जाने के बड़ी दुख भइल सोंचल लोग जवनेगाँ एतना मिलल हS ओहींगा एक सिक्का अउरी मिली गइल रहीत तS कम से कम सौ तS पूरा हो गइल रहीतS।

रमायन अपनी मलिकाइन से बोली पड़ने की अगर कलिहाँ हम बजारे से नून-तेल नाहीं खरीदी के ले आइल रहतीं तS एतनी बेरा हमनीजान की लगे एगो खजूरछाप पूरा हो गइल रहीत। रमायनब कहली की तूँ ठीक कहतारS, आजु की बाद खइले-पिएले-पहिनले आदी में कटौती कS के पइसा बचावल जाई। अउरी ओई दिन की बाद धीरे-धीरे रमायनो की घर के उहे हाली हो गइल जवन चिखुरी की घर के रहे। अब चिखुरीबS के निनानबे के चक्कर समझी में आ गइल रहे।

इ गलत नइखे कहल, “साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाए।”

हाँ तS हमरी कहले के इ मतलब नइखे की निनानबे की चक्कर में न पड़ल जाव, पड़ल जाव लेकिन एगो सीमा तक, खाईं-पी मस्त रहीं, जेतने में रहीं। खरच कइल गलत ना होला पर जरूरत की हिसाब से खरच करीं न की सुबिधा की हिसाब से। जय-जय।

 पं. प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया

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