प्रेम -दीप

मोहब्बत के दीये, ऐसे जलाएं,

गगन के तारकों से जगमगायें .

जहाँ नफरत की आँधी तोड़ती ,दरवाज़ा -ए -मिल्लत ,

चलो वैसे जहां को, भूल जाएँ .
महकते फूल की मानिंद ,कुछ एहसान यूँ कर दें ,

मचलती तितलियों को खूब भायें.
यही अंजाम होना है ,यहाँ पर प्यार वालों का ,

हँसे दो पल औ फिर आँसू बहायें .
कभी दीपक ,कभी जुगनू व सूरज -चाँद सा बनकर ,

उजालों की नयी महफिल

सजायें।
मोहब्बत के दीये, ऐसे जलाएं।

गगन के तारकों से जगमगायें।

  • संजय कुमार चतुर्वेदी

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