बारिश, बरबादी और बीमा

मौसम का मिज़ाज़ कब बदल जाये, कोई नहीं जानता। गीतों में मौसम को बेवफ़ा कहा जाता है। इस बार मौसम एकाएक ऐसा बदला था कि अब ये भी याद दिलाना पड़ रहा था कि मार्च का महीना है। ये मार्च में मॉनसून जैसा हाल रहा। मौसम में आए अचानक बदलाव ने आम आदमी से लेकर सरकारों तक को मुश्किल में डाल दिया। पूरा देश बारिश की बौछारों से मुश्किल में था। श्रीनगर में बर्फबारी होने लगी और मैदानी इलाकों में ठंड बढ़ गई।  जम्मू-कश्मीर के कई अहम रास्तों पर आवाजाही पूरी तरह बंद कर देनी पड़ी। गांवों में किसानों की फसल चैपट हो गई। शहरों में ट्रैफिक की रफ्तार पर ब्रेक लग गया।
मौसम विशेषज्ञों की मानें तो उस वक्त देश का बड़ा हिस्सा बारिश के कहर से जूझ रहा था। फिर चाहे वो पंजाब हो, दिल्ली या फिर महाराष्ट्र। हर जगह बरसात ने तबाही मचा रखी थी। होली करीब थी। एक ऐसा वक्त जब गर्मी दस्तक दे चुकी होती है और मौसम खुशगवार होता है लेकिन बिन मौसम बारिश ने मौसम के मिजाज को पूरी तरह बदल कर रख दिया था। मार्च के महीने में अगर कंपकपी छूट रही थी तो इसकी वजह थी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस। देश के अस्सी फीसदी हिस्से में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का असर नजर आ रहा था। खास बात यह था कि इस बार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस काफी प्रबल बताया जा रहा था जिसकी वजह से तमाम जगहों पर तेज़ बारिश का सामना लोगों को करना पड़ रहा था। जिन मैदानी इलाकों में बारिश नहीं भी हो रही थी वहां भी ठंड बढ़ गई थी। पारा सामान्य से कई डिग्री नीचे गोता लगा रहा था। यानी श्रीनगर में होने वाली बर्फबारी ने कुछ ही दिनों में मैदानी इलाकों के लिए मुश्किल पैदा कर गई।
वह बिन मौसम की बारिश किसानों के लिए तबाही का पैगाम लेकर आई थी। बड़े पैमाने पर गेहूं की खड़ी फसल चैपट हो चुकी है। दालों और फलों को भी बारिश ने भारी नुकसान पहुंचाया है। अब किसान सरकार से मुआवजों की मांग कर रहे हैं। मार्च की शुरुआत यानी कटाई का मौसम, ऐसा मौसम जब लहलहाते हुए खेतों से खु़शी घर आती है और होलिका दहन में अन्न के पहले दाने को समर्पित किया जाता है। लेकिन बिन मौसम हुई बारिश की मार ने सब कुछ बर्बाद कर दिया है। इस ऊट पटांग मौसम की अगर सबसे ज्यादा मार किसी पर पड़ी है तो वो किसान ही हैं। उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में खड़ी हुई फसल चैपट हो चुकी है। जो फसलें बर्बाद हुई हैं उनमें गेहूं, सरसों, अरहर, आम, लीची, टमाटर जैसी अहम फसलें शामिल हैं। कई प्रदेशों में इस बरसात ने किसानों को रोने पर मजबूर कर दिया है। गुजरात में गेहूं समेत धनिया और जीरा को बड़ा नुकसान पहुंचा है।
बरसात के बाद रात गई, बात गई, वाली बात नहीं रही। हमारे राजनैतिक चिंतक अपने जनाधार और अपनी लोकप्रियता की चिंता में किसानों के विरोधों का समर्थन करने लगे। उनके आँसुओं को पोंछने के लिए अपने रूमाल और आँचल को किसानों के सामने पसारने लगे। राजस्थान से उत्तर-प्रदेश तक का दौरा प्रारंभ हो गया। मैडम से साहब तक सब अपना-अपना दाँव आजमाने लगे। सोनिया गांधी का वार प्रत्याहार चल पड़ा तो अखिलेश ने मुवाबजे की
घोशणा प्रारंभ कर दी। वस्तुतः इन सभी कार्य कलापों में किसानों की चिंता कम, अपने जनाधार की चिंता
अधिक रही।
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने एक दूर-दृष्टि अपनाते हुए कहा कि केंद्र किसानों के लिए सॉयल हेल्थ कार्ड योजना ला रहा है। एक-एक किसान की जमीन जांचकर यह कार्ड दिया जाएगा। किसानों के बुढ़ापे में मदद के लिए सरकार पेंशन स्कीम भी ला रही है। 60 साल या अधिक उम्र वाले किसानों को 5,000 प्रति माह तक पेंशन मिलेगी। बर्बाद हुई फसल का सर्वे कर मुआवजा देने के निर्देश दिए गए हैं। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर हुसैनीवाला में लोगों को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि देश विकास करेगा तो फायदा किसान और उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी मिलेगा। खेती के अलावा अन्य रोजगार के अवसर बनेंगे। अगर आप विकास नहीं चाहते तो आपके बच्चों का भविष्य क्या होगा। हुसैनीवाला वो जगह है जहां 1931 में इनका अंतिम संस्कार किया गया था। इन्हें 23 मार्च, 1931 को फांसी दी गई थी। 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी शहीद दिवस पर हुसैनीवाला आए थे। उनके बाद मोदी यहां आए। उन्होंने कहा कि अब न्यूनतम समर्थन मूल्य(एमएसपी) को खत्म करने के उद्देश्य से यह इंश्योरेंस स्कीम लाई जा रही है। इसमें रिस्की क्रॉप पर प्रीमियम ज्यादा और कैश क्रॉप पर प्रीमियम कम है, जबकि यह उल्टा होना चाहिए था। अगर बाजार भाव में एमएसपी से बहुत ज्यादा अंतर आता है तो बीमा कंपनी केवल अधिकतम 20 फीसदी नुकसान की ही भरपाई करेगी। इसकी जगह सरकार को स्टेट फॉर्मर इनकम कमीशन बनाना चाहिए। इसमें भौगोलिक परिस्थिति, प्रति हेक्टेयर पैदावार के आधार पर एवरेज प्रॉडक्शन तय करके किसानों की न्यूनतम इनकम तय करनी चाहिए। इसी आधार पर इंश्योरेंस स्कीम भी लाई जा सकती है। अब तो स्पश्ट हो जाता है कि बारिष के बाद फसलों की जो बरबादी हुई थी, सरकार द्वारा प्रस्तुत की जा रही बीमा की बात से किसाने के कश्टों को थोड़ा राहत तो मिलेगा ही, किसानों को अपने मेहनत पर गर्व भी होगा। उन्हें पुनः ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे का बल अनुभव होगा।
  •  डॉ संजय सिन्हा

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