बिहार और बिहारी

कुलदीप श्रीवास्तव

यह सन् 2002 की बात है जब बिहार के सीवान जंक्शन से चली ट्रेन ने रोजी-रोटी की तलाश वाले कई लोगों के साथ मुझे भी देश की राजधानी दिल्ली के प्लेटफाॅर्म पर उतारा था। छोटे से शहर से अचानक बड़ी अट्टालिकाओं वाले शहर में आकर ऐसा लगा कि जैसे मैं किसी भूल-भुलैया में आ गया हूं। जब किसी से भोजपुरी प्रभाव वाली हिंदी में कुछ पूछता तो सामने वाले का सबसे पहला वाक्य होता कि ‘बिहार से हो?’ और यह कोई सामान्य सा प्रश्न नहीं होता था, बल्कि इसमें कहीं न कहीं व्यंग्य-मजाक या यूं कहें कि हिकारत का भाव ही सर्वोच्च होता। तब लगता कि अब तक पढ़ा सुना ‘हिंद देश के निवासी, सभी जन एक हैं…’ केवल कहने के लिए है। दिल्ली में ‘बिहारी’ शब्द एक प्रकार की गाली के तौर पर ही इस्तेमाल होता था। बाद में मुझे अहसास हुआ कि यह वे लोग हैं जो बिहार और उसके निवासियों को ना तो जानते ही हैं, ना ही समझते हैं, साथ ही इनके अंदर बहुत हद तक बिहारियों के प्रति ईष्र्या का ही भाव है। और ऐसा इसलिए क्योंकि बिहारियों के साथ प्रतिस्पर्धा में वे नौकरी पाने में पीछे रह जाते हैं।
बिहार को करीब से जानने के लिए यह स्मारिका एक तुच्छ प्रयास है। बिहार अपनी ऐतिहासिकता के लिए विश्वविख्यात है। पर, पिछले कुछ दशकों में बिहार
पाषाणकालीन युग में चला गया था जिससे दुनिया को बिहार के बारे में और भी
अधिक भ्रांति होने लगी थी। अब संसार
बिहार को और भी करीब से जानने का
इच्छुक दिख रहा है। प्राचीनकालीन
मेधा के रूप में चाणक्य और
आधुनिक मेधा के रूप में डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद जहां बिहारी प्रतिभा के सर्वश्रेष्ठ मिसाल हैं,तो दुनिया को शून्य की समझ देने वाले आर्यभट्ट ने पूरे विश्व का गणित के क्षेत्र में नेतृत्व किया। बाबू कुंवर सिंह ने इसी माटी में जीत का जज्बा भरा है। आजादी के बाद बिहार से बनने वाले प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर जगजीवन राम तक देश को दिशा देने वाले महापुरूष इसी धरा से पैदा हुए हैं।
संविधान निर्माण के दौरान जहां सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी प्रतिभा का परिचय करवाया तो वहीं दूसरी ओर केंद्रीय सरकार में कृषि मंत्री के रूप में हरित क्रांति के लिए प्रशासनिक आधारशिला स्थापित करने में बाबू जगजीवन राम के अमूल्य योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता। बिहार की माटी ने अगर वीरों का बसंत देखा हे तो यहां की वीरांगनाएं भी किसी मामले में पुरूषों से कमतर नहीं रही हैं। इतिहास की दृष्टि से देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह राज्य सदा सत्ता के केन्द्र में रहा है। चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर सम्राट अशोक आदि शासकों की गाथा आज भी अमर है। यह माटी सिकंदर के आक्रमण को चंद्रगुप्त मौर्य के शौर्य से चुनौती देती है। दुनिया ने चाणक्य का तेज देखा है तो महान अशोक का शांति प्रेम भी। लेकिन एक सवाल यह भी है कि नालंदा विश्वविद्यालय की पहचान और बुद्ध एवं महावीर की
कर्मस्थली बन अगर यह क्षेत्र कभी मानवता का पाठ पढ़ाता था तो यह सर्वाधिक बीमारू राज्यों में और निरक्षर आबादी वाले राज्य में कैसे रूपांतरित हो गया? सवालों को कुरेदा जाना स्वाभाविक है।
बिहार के वर्णन के साथ इतिहास का सुनहला अध्याय जुड़ा है। बिहार ने दुनिया को उत्थान का ज्ञान प्रदान किया था। जब दुनिया में विश्वविद्यालय नामक शब्द प्रचलन में भी नहीं आया था, तब उस धरा पर नालंदा शिक्षा का वैश्विक केन्द्र था। हम जिस राज्य की चर्चा कर रहे हैं यह वही पुण्य भूमि है जो धर्म और दर्शन का एक मुख्य केंद्र माना जाता था। मुख्यतः ‘बिहार’ तब अस्तित्व में आया जब गुप्त और मौर्य काल का सुनहरा अध्याय चल रहा था किंतु सन् 1199 में बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को पूरी तरह जलाकर नष्ट कर दिया था। उस पर से जो अवशेष इधर उधर फैले भी थे उसे ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्यवाद ने लील लिया। नालंदा की कई आध्यात्मिक, उच्च शैक्षिक और संजीदा पाण्डुलिपियां आज कैंब्रिज विश्वविद्यालय लाइब्रेरी की शोभा में चार चाँद लगा रही हैं। उन्हीं पाण्डुलिपियों पर शोध के लिए हमें यूके जाना पड़ता है। अंग्रेजों द्वारा पढ़कर बताए गए अक्षरों को हम अपना कहने का भ्रम पाले हुए हैं। बिहार के गौरवशाली इतिहास के किस्से हजारों आपको मिलेंगे। बिहार, बिहारियों का गौरवशाली इतिहास, सभ्यता, कला-संस्कृति, धर्म और संस्कार का प्रभाव आज भी हमारे देश और समाज पर कहीं गहरे व्याप्त है।
इसे हम भूले नहीं हैं, आज भी बिहारी अपने अतीत से प्रेरणा लेकर देश ही नहीं विदेशी धरती को भी सुवासित कर रहा है है। आज माॅरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, नीदरलैंड, त्रिनिदाद, टोबैगो जैसे देशों में
बिहारी जनसमूह अपना परचम बड़े गर्व से फहरा रहा है। माॅरीशस में गन्ने की खेती के लिए धोखा से ले जाए गए गिरमिटिया मजदूरों ने वसुधैव कुटुंबकम्‌ की भावना से ओत-प्रोत हो कर उस मिट्टी को अपने खून-पसीने से सींचना शुरू किया। बंजर जमीनें लहलहा उठीं और आज माॅरीशस दुनिया का जीता-जागता स्वर्ग बन गया है। यह बिहार की माटी की ताकत ही है कि देश के बाहर एक और भारत का निर्माण संभव हुआ जिस पर केवल बिहार की ही नहीं बल्कि पूरे भारत के नागरिक गर्व करते हैं।
बिहार की प्रमुख बोली भोजपुरी की मधुरता और प्रेमभाव अन्य भाषा-भाषियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मगर पिछले कुछ दशकों से स्तरहीन भोजपुरी फिल्मों के डायलाॅग और अलबमों ने बिहार की गरिमा को धूल-धूसरित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। यह भार आज के युवा कंधों पर है कि वे आगे आकर इस दिशा में सार्थक प्रयास करें। इसके अलावा जंगलराज ने भी बिहार की छवि को धूमिल किया है एवं स्तरहीन शिक्षा व्यवस्था एवं परीक्षाओं में कदाचार ने भी बिहारी मेधा को देश दुनिया में मजाक का पात्र बना दिया है। अगर हम सिक्के के इस नकारात्मक पहलू को दूर करने में कामयाब हो जाएं तो बिहार-बिहारियों के गौरवशाली इतिहास का कोई सानी नहीं है।
बिहार अपने आप में एक लघु
भारत है। देश का कोई राज्य नहीं, जहाँ का निवासी बिहार में न हो। भाषा के मामले में भी यही स्थिति है। पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगु, नेपाली आदि अनेक भाषाओं वाले इंसान यहाँ बसते हैं। वे तमाम लोग दूध में शक्कर की तरह स्थानीय लोगों से हिलमिल गए हैं। आज हम ‘सेलिब्रेटिंग बिहारी इंटेलिजेंस’ के माध्यम से बिहार और बिहारियों के गौरवशाली इतिहास को दर्शाने का एक तुच्छ प्रयास कर रहे हैं। इस प्रयास में कुछ कमियां निस्संदेह होंगी, गलतियां भी अवश्य होंगी किंतु वह निश्चित रूप मेरी जवाबदेही होगी। इस महत्वपूर्ण पहल के लिए बिहारी कनेक्ट और उसके चेयरमैन उदेश्वर सिंह को साधुवाद!

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