भोजपुरी भाषा का संसद के दरवाजे पर दस्तक

भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची मे सम्मिलित कराने हेतु भिन्न भिन्न समय पर अनेक विभूतियों ने अपने तरीके से मातृभाषा भोजपुरी के लिए अपनी आवाज बुलंद की । भोजपुरी भाषा की मान्यता के लिए आजादी के पूर्व से ही आवाज उठाने लगी थी । बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के भोजपुरी विभागाध्यक्ष डा० जयकान्त सिंह जय का मानना है कि भोजपुरी भाषा, संस्कृति, क्षेत्र और जनता का विकास निमित्त भोजपुरी आंदोलन 1940 ई० में जनपदीय आंदोलन के रुप मे शुरु हुआ। लेकिन इस मुद्दे को संसद मे पहली बार संसद मे निजी विधेयक के रूप मे सांसद भोगेंद्र झाँ ने 21 फरवरी 1969 को उठाया । जिससे भोजपुरी भाषा की मान्यता हेतु उठाने वाली आवाजों को बल मिला । उसके उपरांत कई संगठन बने , कई पत्रिकाएँ शुरू हुईं और सभी ने अपने अपने तरीके से भोजपुरी भाषा की मान्यता प्राप्ति की लौ जलाते रहे । सन 1976 मे केदार पांडे की अध्यक्षता मे बिहार मे भोजपुरी अकादमी की स्थापना का निर्णय और सन 1978 मे बिहार सरकार ने भोजपुरी भाषा को सरकारी संरक्षण हेतु मान्यता प्रदान की ।

जनपदीय आंदोलन के गंगा जमुना और सरस्वती रुपी इन तीनों धाराओं के महासंग्राम स्थल तब के सारण जिला के सिवान मे था । 1947 मे सबसे पहले सिवान मे ‘भोजपुरी प्रांतीय सम्मेलन’ हुआ। सारण जिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के स्थापना के बाद भोजपुरी लेखन, कवि सम्मेलन, पुस्तक प्रकाशन और अधिवेशन वगैरह का सिलसिला शुरु हुआ। सन् 1950 मे खाकी बाबा बक्सर मे ‘भोजपुरी साहित्य मंडल’ का गठन कर भोजपुरी लेखन एवं आंदोलन को तेज करने मे सहयोग किए। अब बिहार के महानगरों मे भोजपुरी को लेकर चिंतन प्रारम्भ हुआ। सन् 1955 ई० मे जमशेदपुर मे ‘जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद्’ का गठन हुआ। देश के राजधानी दिल्ली के भोजपुरी समाज के लोग 1960 ई० मे ‘भोजपुरी परिषद्’ बना कर संगठित होने लगे । सन् 1964 मे डा० स्वामीनाथ सिंह वाराणसी मे ‘भोजपुरी संसद’ का स्थापना कर के भोजपुरी लेखन एवं प्रकाशन मे बेजोड़ योगदान दिया।

जुलाई 1971 ई० मे दुनिया मे पहली बार बी० आर० ए० विश्वविद्यालय (तत्कालीन बिहार विश्वविद्यालय), मुजफ्फरपुर (बिहार) के लंगट सिंह महाविद्यालय मे प्रवेशिका (इंटरमीडिएट) और स्नातक प्रतिष्ठा स्तर के लिए ‘भोजपुरी भाषा-साहित्य’ के अध्ययन अध्यापन के काम से श्री गणेश हुआ और इसके लिए कई पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। इसके बाद जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय आरा मे भी भोजपुरी भाषा की पढाई शुरु हो गई ।

डॉ प्रभुनाथ सिंह ने भोजपुरी भाषा मान्यता आंदोलन को सन 1994 मे  भोजपुरी अभियान समिति के बैनर तले गति प्रदान की । डॉ प्रभुनाथ सिंह की अगुवाई मे 27 फरवरी 1996 को इसके तहत राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया । भोजपुरी भाषा की मान्यता के लिए बहुत सारी संस्थाओं ने अपना अहम योगदान दिया , जिसमे विश्व भोजपुरी साहित्य सम्मेलन , विश्व भोजपुरी सम्मेलन , पूर्वाञ्चल एकता मंच , भोजपुरी समाज दिल्ली उल्लेखनीय हैं ।

वर्तमान मे सैकड़ों की संख्या मे पत्र पत्रिकाएँ भोजपुरी भाषा की मान्यता हेतु अपने अपने ढंग और तरीके  से भाषा की मान्यता की मांग को पुरजोर तरीके से समाज और सरकार के समक्ष रखने मे सक्षम होती दीख रही हैं । इसमे कुछ उल्लेखनीय पत्रिकाए  पाती , भोजपुरी माटी , भोजपुरी जिनगी , भोजपुरी संगम , भोजपुरी पंचायत , आखर , लकीर , डिफेंडर , भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका , भोजपुरी साहित्य सरिता (साहित्यांगन ) इत्यादि हैं ।  इस आंदोलन को धार देने के लिए बना संगठन “ भोजपुरी जन जागरण अभियान”  युवाओं को अपने साथ जोड़कर आंदोलन को ब्यापक बनाया । इसके बैनर तले अब तक 5 धरना प्रदर्शन जंतर मंतर पर क्रमशः 6 अगस्त 2015 , 10 दिसंबर 2015 , 21 फरवरी 2016 , 8 अगस्त 2016 और 15 नवंबर 2016 को आहूत हुये जिसकी अगुवाई भोजपुरी के कर्मठ सिपाही संतोष पटेल ने इसको सफलता पूर्वक सम्पन्न कराया । भोजपुरी जन जागरण अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संतोष पटेल के नेतृत्व मे आंदोलन को ब्यापकता प्रदान की गयी । अब यह आंदोलन ब्यक्तिवादी न होकर जन आंदोलन का स्वरूप अख़्तियार करता जा रहा है । इस आंदोलन से वह हर ब्यक्ति जुड़ा और जुड़ता जा रहा है जिसके मन मे अपनी मातृभाषा का सम्मान है , उससे स्नेह है । आज का युवा वर्ग इंटरनेट सेवी है , आंदोलन को ब्यापक बनाने के लिए आज वह उन प्रत्येक माध्यमों का सफलता पूर्वक प्रयोग कर रहा है । आज चाहे वह फेसबुक हो , ट्वीटर हो , गूगल प्लस हो , प्रिंटरेस्ट हो या फिर इन्स्टाग्राम , भोजपुरी भाषा मान्यता आंदोलन की गूंज और पहुँच हर जगह दीखने लगी है ।

भोजपुरी जन जागरण अभियान के प्रयासों से भोजपुरी भाषा मान्यता आंदोलन की गूंज शहर के कमरों से निकलकर गाँवो , कस्बों और नुक्कड़ों पर सुनाई देने लगी है । भोजपुरी जन जागरण अभियान जो कि भोजपुरी भाषा को भारतीय संविधान मे शामिल कराने के लिए कृतसंकल्पित है । 21 फरवरी 2016 को तीसरा धरना का आयोजन किया जिसकी आध्यक्षता प्रो० शत्रुघ्न कुमार ने किया। सरकार के तरफ से कुछ भी सकारात्मक ना देखते हुए संगठन ने चौथा धरना का आयोजन 8 अगस्त 2016 को फिर दिल्ली के ही जंतर मंतर पर प्रो० पी राज सिंह के अध्यक्षता मे किया। इस बार कुछ सांसदों को भोजपुरिया आवाज का एहसास हुआ और लम्बे अरसे बाद सदन मे मनोज तिवारी मृदुल और बेतिया के सांसद संजय जयसवाल ने सवाल उठाया। धरना मे इस बार सांसद संजय जयसवाल पहुँचे और उन्होने आश्वासन दिया कि जल्द ही भोजपुरी आठवी अनुसूची मे शामिल होगी। परन्तु मानसून सत्र बीतने के बाद भी भोजपुरी के लिए सदन मे बिल नही आया ।

इस बात को देखते हुए संगठन ने देश भर से भोजपुरी भाषियों का जमावड़ा कर 15 नवम्बर 2016 को शीतकालीन सत्र से ठीक पहले एक धरना का आयोजन किया जिसकी आध्यक्षता डा० जयकान्त सिंह जय ने किया। जबरदस्त तरीके से आवाज उठाने वालों मे रंगकर्मी महेन्दर प्रसाद सिंह, संजय ऋतुराज, प्रमेन्द्र सिंह, विश्वनाथ शर्मा, धनन्जय कुमार सिंह, लाल बिहारी लाल , जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  , केशव मोहन पांडेय, मनोज कुमार सिंह, बलिदान भोजपुरी फिल्म अभिनेता सत्यकाम आनन्द, मंगलेश भोजपुरिया , ओ पी पाण्डेय आदि शामिल हुए । लेकिन यह सत्र नोटबंदी की भेंट चढ़ गया और भाषा मान्यता की दिशा मे कोई कार्य नहीं हो सका । अभी कुछ दिन पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश की एक सभा मे कहा कि भोजपुरी को शीघ्र ही आठवीं अनुसूची मे शामिल कर लिया जाएगा । इस विषय मे प्रधानमंत्री की भी स्वीकृति मिल गई है । परन्तु दुर्भाग्य कि इस शीतकालीन सत्र में भी ऐसा नही हो सका और भोजपुरी संसद के दरवाजे पर दस्तक दे कर भी आठवीं अनुसूची मे सम्मिलित होने से वंचित रह गयी।

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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