भोजपुरी भाषा पर क्यों मची खलबली?

अजीत दुबे@bhojpuripanchayat.in – भोजपुरी संवैधानिक मान्यता की दहलीज पर खड़ी है। केंद्रीय सरकार में शामिल कई मंत्रियों द्वारा दिये गए हालिया आश्वासनों से यह उम्मीद सबल हुई है। 20 करोड़  भोजपुरी भाषियों के लिए यह जहाँ सुकून देने वाली सूचना है वहीं दूसरी ओर चंद कथित हिंदी सेवी, हिंदी बचाओं का अनर्गल व बेतुका प्रलाप कर रहे हैं। इन छद्म हिंदी के हितैषियों को ऐसा लगता है कि भोजपुरी कि संवैधानिक मान्यता से हिंदी विखंडित होगी। इस तरह वे लोग सोशल मीडिया में हिंदी बनाम भोजपुरी का प्रपंच रच रहे हैं। लेकिन हकीकत में हिंदी बनाम भोजपुरी की आपसी प्रतिद्वंदिता जैसा कुछ भी नहीं है। इन दोनों भाषाओं का परस्पर संबंध अद्भुत समन्वय का प्रतिक रहा हैं। गिरमिट प्रथा के अंतर्गत विदेश में गए भोजपुरी प्रवासियों ने अपना खून-पसीना बहाकर हिंदी की ज्योति  प्रज्जवलित की जो आज भी अपना प्रकाश फैला रही है। जिस भोजपुरी भाषा ने हिंदी के उत्थातन और विकास तथा उसे उसका हक दिलाने के लिए कोशिश की, वही भोजपुरी भाषा जब आज संवैधानिक मान्यथता पाने के निकट आकर खड़ी है तो हिंदी के कुछ विद्वान और पैरोकार भोजपुरी की संवैधानिक मान्यकता की राह में रोड़ा अटकाने के लिए प्रयासरत हैं।
हिंदी के इन कथित पैरोकारों की ओर से अनगिनत बेतुके तर्क दिए जा रहे हैं और हिंदी और भोजपुरी को एक दूसरे के विरोध में खड़ा करने का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। उनके द्वारा यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से हिंदी कमजोर  होगी, हिंदी का दायरा कम होगा, उसका संख्या बल घटेगा और यह स्थिति अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ाने में सहायक होगी। जबकि सच्चाई तो यह है कि भोजपुरी और हिंदी में आपस में न तो कोई प्रतिस्पयर्धा है ओर न ही उनका आपस में कोई टकराव। मां और बेटी के पावन रिश्तो में बँधी भोजपुरी और हिंदी एक दूसरे की सदा से हितैषी रहीं हैं और भविष्य में भी उनका यही रिश्ताई कायम रहने वाला है।
हिंदी के कुछ पैरोकार भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता को हिंदी के समक्ष खड़ी चुनौतियों से जोड़कर देखते हैं और उन्हें लगता है कि भोजपुरी की संवैधानिक मान्यमता के बजाय हिंदी के बचाव-बढ़ाव के लिए प्रयास किए जाने की ज्याादा जरूरत है। उल्लेाखनीय है कि सम्पूर्ण देश में सम्पर्क भाषा के रूप में, आंतरिक व्यापार और व्ययवसाय की भाषा के रूप में, मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी दिन प्रतिदिन आगे बढ़ रही है। सरकारी और गैर सरकारी, दोनों ही स्तरों पर हिंदी के प्रचार-प्रसार और बचाव-बढ़ाव के लिए खूब प्रयास किए जा रहे हैं। गर्व का विषय है कि हिंदी अब विश्व की नं एक भाषा भी बन चुकी है। यह विडंबना जरूर है कि भारत में रोजगार के क्षेत्र में अंग्रेजी के आगे हिंदी कहीं पीछे छूटती सी दिख रही है और अंग्रेजी से उसे कड़ी चुनौती मिल रही है। हालांकि हिंदी में भी पहले की तुलना में रोजगार के अवसरों में थोड़ी वृद्धि अवश्यी हुई है। पर निरूसंकोच यह कहा जा सकता है कि भारत जैसे देश के लिए यह पर्याप्ति नहीं है। कड़वी सच्चाई यह भी है कि संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी को पूरी तरह से स्थािपित करने के लिए भारत सरकार जितना संसाधन उपलब्धै करा रही है, परिणाम उसके अनुरूप नहीं हैं। हिंदी को लेकर ये चिंताएं अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं। हिंदी से अथाह प्यार और अपनत्व रखने वाले भोजपुरी भाषी इन चिंताओं से पूरी तरह से वाकिफ हैं और इससे पूरा सरोकार रखते हैं तथा विभिन्नन माध्यमों से वे हिंदी की बेहतरी के लिए भी चिंतन-मनन और प्रयास कर रहे हैं। अपनी मातृभाषा भोजपुरी से उन्हें जितना लगाव है उतना ही लगाव हिंदी से भी है। अपनी मातृभाषा के सम्मान की उनकी मांग को हिंदी को नुकसान पहुंचाने के किसी कदम के रूप में देखना तर्कसंगत नहीं है।
हिंदी के तथाकथित पैरोकारों का एक प्रमुख तर्क यह है कि अगर भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो गई तो आने वाले दिनों में भोजपुरी भाषी, जो अब तक अपनी मातृभाषा हिंदी बताते थे, वे भोजपुरी को अपनी मातृभाषा बताने लगेंगे और इन लोगों की गणना अब हिंदी भाषी के रूप में नहीं हो सकेगी और इस प्रकार हिंदी के संख्या बल में कमी आ जाएगी और हिंदी की ताकत घटेगी तथा अंग्रेजी का वर्चस्वी बढ़ेगा और कुल मिलाकर राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की स्थिति पर नकारात्मकक असर पडेगा। यहां यह समझना होगा कि इस तर्क में बहुत दम नहीं है। भारत सरकार को इसका समाधान आसानी से मिल सकता है। जनगणना विभाग
द्वारा जनगणना के लिए प्रयोग किए जाने वाले प्रपत्र में भाषा संबंधी जानकारी के लिए दो काॅलम
उपलब्धन हैं जिसमें से पहले काॅलम में मातृभाषा की जानकारी देनी होती है तथा दूसरे में
अधिकतम उन दो अन्यि भाषाओं की जानकारी देनी होती है जिन्हें संबंधित व्यवक्ति जानता है। जनगणना के समय हिंदी भाषी राज्यों में पहले काॅलम में मातृभाषा के रूप में तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषा का ही उल्लेहख किया जाए जैसे कि भोजपुरी क्षेत्र में मातृभाषा के रूप में भोजपुरी का उल्लेयख किया जाए तथा दूसरे काॅलम में अन्य भाषा के रूप में हिंदी को दर्शाया जाए और जब हिंदी के संख्योबल की बात हो तो दूसरे काॅलम के आंकडे को इस मकसद के लिए प्रयोग किया जाए। इस प्रकार हिंदी क्षेत्र की किसी लोक भाषा के 8वीं अनुसूची में शामिल होने व उसे मातृभाषा के रूप में दर्शाए जाने पर भी हिंदी के संख्याषबल पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा। स्पष्टि है कि भोजपुरी के 8वीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी के संख्याूबल पर कोई नकारात्मंक असर नहीं पडने वाला है।
राजभाषा के रूप में हिंदी के विकास के लिए संविधान के अनुच्छेेद 351 में यह प्रावधान किया गया है कि हिंदुस्तानी और 8वीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भाषाओं के प्रयुक्तय रूप, शैली और पदों को आत्मकसात करते हुए और जहां आवश्य क या वांछनीय हो वहां मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः इन भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए हिंदी का शब्दह भंडार बढाया जाए और इस प्रकार उसकी समृद्धि सुनिश्चित की जाए। स्पष्ट है कि आठवीं अनुसूची में शामिल होकर भोजपुरी हिंदी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी बल्कि हिंदी को समृद्ध करने में योगदान करेगी। भोजपुरी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग में न तो किसी भाषा विशेष या अन्य भाषाओं के विरोध का भाव निहित है और न ही किसी भाषा को कमजोर करने या उसे किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाने की कोई मंशा इसके पीछे है। यह भोजपुरी के लिए उसके सम्मान, उसकी अस्मिता एवं उसकी पहचान की मांग है और साथ ही संवैधानिक मान्यसता प्राप्त भाषाओं को मिलने वाली सुविधाओं और फायदों की मांग। इस मांग के पीछे ठोस तर्क और व्या्पक आधार है। भारत में हिंदी के बाद सबसे अधिक एवं दुनिया भर के 16 देशों में 20 करोड़ से भी ज्यानदा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी, जिसे मारिशस में संवैधानिक मान्याता प्राप्त है, अपने देश में संवैधानिक मान्यता प्राप्त न होने की वजह से बहुत सारी सुविधाओं और फायदों से वंचित है। उदाहरण के लिए भोजपुरी रचनाएँ भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, सरस्वती सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नहीं हो सकतीं, इस भाषा और उसके साहित्य के विकास के लिए भारत सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हो सकती, भोजपुरी फिल्में देश के राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर नहीं दिखाई जा सकतीं, भोजपुरी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त नहीं हो सकते, संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भोजपुरी को परीक्षा का माध्यम नहीं बनाया जा सकता, साहित्य अकादमी द्वारा भोजपुरी भाषा में साहित्यिक गतिविधियों का संचालन नहीं किया जाता जबकि अंग्रेजी और राजस्थानी सहित आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओ में ये गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। ये कुछ ऐसे तथ्या हैं जो इस भाषा के विकास को तो प्रभावित करते ही हैं साथ ही इसके बोलने वालों, इसके साहित्याकारों व कला के क्षेत्र से जुडे लोगों पर भी प्रत्याक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव डालते हैं। यदि ये सुविधाएं भोजपुरी को भी प्राप्त हों तो इसके साहित्यय, कला व संस्कृरति आदि को और बढ़ावा मिलेगा और लोगों को रोजगार के अवसर व इसी प्रकार के अन्यत कई फायदे एवं सुविधाएं प्राप्तर होंगी।
आधारहीन तथ्यों और खोखले तर्कों के माध्यम से लोगों को गुमराह करने और भ्रम पैदा करने के बजाय हिंदी और भोजपुरी के आपसी संबंधों को सकारात्म‍क दृष्टि से देखने की आवश्कता है। इन दोनों भाषाओं के बीच वैमनस्या और मनमुटाव पैदा करने की कोशिश करने वाले लोग न तो हिंदी के हितैषी हो सकते हैं और न भोजपुरी के। अनर्गल प्रलाप न करके इन दोनों भाषाओं के बीच आपसी सौहार्द, सद्भाव और संवाद को मजबूत करने की दिशा में ध्यानन केंद्रित कर इन दोनों भाषाओं का ज्यातदा कल्याण किया जा सकता है। हिंदी के प्रति आदर, सद्भाव, स्नेनह और सौहार्द कायम रखते हुए भोजपुरी के सम्माजन, सुविधा, अस्मिता और पहचान की यह मांग अनुनय, विनय और विनम्रता के साथ लक्ष्य् हासिल होने तक जारी रहेगी।

Leave a Comment