भोजपुरी सिनेमा: स्वर्णिम दौर में

54 साल की कालावधि कम नई होती। इतने समय में कई विचारधाओं का उत्थान-पतन हो गया होता है। प्रौढ़ता के इस दौर में जीवन जीने के मायने बदल गए होते हैं। गंभीरता का आवरण व्यक्तित्व को आदर्श के उच्चासन पर विराजमान कर चुका होता है। अपनी अनुभवों नजरों से जीवन के इतने उतार-चढ़ाव को देख चुका होता है कि जीवन की विराटता और क्षणभंगुरता का आभास उसके अपने होते हैं। कालखंडों के आधार पर तो मान, सम्मान, अपमान आदि सबका अपना वजूद होता है। उम्र के आधार पर तो एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा का भी प्रावधान है। किशोर को जैसी सज़ा दी जाती, प्रौढ़ को उससे अधिक और नाबालिक को तो आप जानते ही है। उसे कारागार की अपेक्षा
सुधार-गृह भेजा जाता है।
उम्र की चर्चा के साथ मैं भोजपुरी सिनेमा की चर्चा करना चाहता हूँ। आज इंटरनेट, चिप, सीडी, फिल्मी-चैनल्स और मल्टीप्लेक्स के इस दौर में सिंगल सिनेमा स्क्रीन की साँसें रूकती जा रही हैं। ऐसे दौर में एकल पर्दे वाले सिनेमाघरों के लिए भोजपुरी फिल्में आॅक्सीजन का काम करने लगी हैं। जो सिनेमाहाल मकड़ों के जाले के साथ उनका घर बनने की कगार पर पहुँच गए थे अब उनमें नव गति, नव लय और नव ताल-छन्द के साथ एक जान सी आ गई है। यह नव-जीवन भोजपुरी सिनेमा से ही मिला है। गोरखपुर, देवरिया, सिवान, छपरा, पटना, राँची आदि भोजपुरी क्षेत्र की बात तो दूर है अब तो भोजपुरी सिनेमा दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल सहित दक्षिण भारत में भी कई जगह चल रही हैं और एक संतोशजनक कमाई का साधन बन गई हैं। एक मैनेजर पहले अपने सिनेमा घर की हालत से बहुत चिंतित रहते थे, अब कहने लगे कि जब से भोजपुरी फिल्में आई हैं, दर्शकों का सूखा खत्म सा हो गया है। हमें तो लग रहा था कि सिनेमाहाल बंद करना पड़ेगा और यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों की रोजी-रोटी छिन जाएगी, लेकिन भोजपुरी फिल्मों के कारण हम बेरोजगार होने से बच गए।
आज के समय में भोजपुरी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुकी है। अब तो भोजपुरी सिनेमा ने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भी अपना परिचय प्रस्तुत कर लिया है। सबको याद होगा कि 21 मिनट की डिप्लोमा भोजपुरी फिल्म
‘उधेड़बुन’ को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2008 के लिए चुना गया था। बाद में इसे राष्ट्रीय अवार्ड में बेस्ट शाॅर्ट फिक्शन फिल्म का अवार्ड मिला। पिछले वर्श ‘गुंजा’ को भी वह सम्मान मिला। इसके आधार पर अब कहा जा सकता है कि अब भोजपुरी फिल्मों के दर्शक देश के साथ विदेशों में भी मिलने लगे हैं। पूरे विश्व में करीब 18 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते एवं समझते हैं। पूर्वांचल और बिहार के अलावा देश के जिन हिस्सों में भी भोजपुरी भाषी काम-धंधा के कारण से रह रहे हैं, वे ये फिल्में बड़ी आत्मीयता से देखते हैं। इसके अलावा माॅरीशस, गुयाना, वेस्टइंडीज, फिजी, नेपाल, दुबई, इंडोनेशिया, नीदरलैंड में भी भोजपुरी बोलने समझने वाले हैं। उनके बदौलत भोजपुरी फिल्मों का व्यावसाय भी आजकल उत्कर्श पर है। पहले कई सालों में भोजपुरी की एक फिल्म बनती थी, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है। अब हर सप्ताह एक फिल्म रिलीज होती है। अब एक साल में करीब 50 भोजपुरी फिल्में बन रही हैं। इन फिल्मों की अधिकरत शूटिंग भोजपुरी भाषी क्षेत्र बनारस, गोरखपुर, बलिया, कुशीनगर, जौनपुर, पटना, आरा, बेतिया, राँची, रामगढ़, हाजीपुर आदि में होने के साथ ही विदेषों में भी हो रही है।
अगर बात केवल भोजपुरी फिल्मों की संख्या या बाढ़ की हो तो इसमे कोई षक नहीं कि आज हम उत्राुंग शिखर पर विराजमान है। साथ ही यह भी जग-जाहिर है कि जब क्वांटिटी बढ़ती है तो क्वालिटी पर बट्््््््््टा लग जाता है। वैसे तो साहित्य और सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है, मगर इस कसौटी पर हमारी प्रगति कितनी हुई है? हमारे फिल्म निर्माताओं को ईमानदारी से सोचना चाहिए कि क्या यह भोजपुरिया समाज के साथ न्याय किया जा रहा है? कहते हैं कि अधिकांष निर्माता गैर भोजपुरिया हैं, उन्हें हमारी संस्कृति का ज्ञान नहीं। मूर्खता की भी हद होती है।
भाई, वे गैर भोजपुरिए अगर भोजपुरी का कल्याण भी करने आते हैं तो कम-से-कम भारत की संस्कृति का ज्ञान तो होगा ही न। वास्तविकता तो यह है कि आज भोजपुरी के नाम पर जो परोसा जा रहा है, उसमें समाज तो दूर-दूर नहीं है। जो है, उसमें अधिकां,ा अ,लीलता है। जब कभी एक-दो फिल्में सामाजिकता को प्रस्तुत भी करती हैं, तो ऐसी सोच वालों को पुरानी सोच वाला व्यक्ति कह कर दरकिनार कर दिया जाता है। आज भोजपुरी सिनेमा का अधिकांश स्वरूप कामुकता को भड़काने वाला, उत्तेजना से परिपूर्ण, अश्लीलता का साकार प्रमाण माना जाता है। आज भोजपुरी सिनेमा दर्शकों के सीने में आग पैदा कर रही है। वह आग क्रांति की नहीं है, भ्रांति की है। काश! दर्शकों में दिल में क्रांति की आग धधक उठती तो इस सिनेमा में जो आग है, कुछ कम हो जाती।
भाई, यह कहा जाता है कि भोजपुरी की एक फिल्म बनाने में की लागत करीब एक करोड़ रूपये है। यह बालीवुड की फिल्मों के मुकाबले कु जो फिल्म कई लाख रूपये में सिनेमाहाल के पर्दे पर उतरती है, वहीं भोजपुरी की फिल्म महज लाख, दो लाख में मिल जाती है।
सिनेमाहालों में यह फिल्म लगती है तो वहाँ भी टिकट की कीमत 10 से 25 रूपये तक होती है। कम कीमत में बालीवुड के मसालों से भरी भोजपुरी फिल्म जमकर चलती है। जब निर्माण में लागत कम है तो कम-से-कम भोजपुरी दर्शकों को स्वस्थ
मनोरंजन भी तो दो। इस पर मेरे एक निर्माता मित्र का दलील था कि भोजपुरी समाज के अधिकांश मजदूर लोग मुंबई, पंजाब आदि जगहों पर अपने परिवार से दूर होकर रोटी कमाते हैं। जब वे शाम को देहाड़ी के बाद घर आते हैं तो उन हारे-थके लोगों को ज्ञान से
परिपूर्ण फिल्में नहीं, मनोरंजन से परिपूर्ण फिल्में चाहिए। ‘मुझे अपने उस मित्र से यह अपेक्षा नहीं थी। तब लगता है कि अच्छा हुआ कि मैं उस क्षेत्र में असफल रहा और बैरन वापस आकर पुनः शिक्षण में लग गया।
भोजपुरी फिल्मों से करीब 70 निर्माता, निर्देशक और हजारों कलाकार जुड़े हुए हैें। इससे करीब एक से डेढ़ लाख लोगों का रोजगार मिला हुआ है। इसमें उन
कलाकारों को हिंदी फिल्मों में भी काम मिल रहा है। यहाँ उनकी फिल्में खूब चल रही हैं। इससे बाहर रोजगार की तलाश मेें जाने वालों का सिलसिला भी रूका है। स्थिति तो यह है कि बाहर के लोगों को यहाँ काम मिल रहा है। बहुत से हिंदी कलाकार भोजपुरी में काम कर रहे हैं। मेरे कुछ मित्र जो गीतकार हैं, अपने ऐसे गीतों का क्लीप मुझे भेजते हैं, जिन्हें एक शब्द के बाद मुझे कान में ईयर-फोन लगाकर सुनना पड़ता है। अंतरंग रिश्ते वाली पत्नी के सामने भी उन गीतों को सुनते समय शर्म आती है। तब समझ में ही नहीं आता कि वह कौन-सी भूख है, जिसके कारण सरस्वती के उपासक कलम को उस तरह से गुलाम बना लेते हैं। मैं तो कई बार उन महान आत्माओं से प्रार्थना कर चुका हूँ कि वे अपनी कल्पना पूर्ण वास्तविक वर्णन को पहले अपने घर के सदस्यों को सुनाकर एक प्रमाण-पत्र ले लें, फिर सार्वजनिक करें। इन बातों को कहने के पीछे में असफलता कारण नहीं है, सत्यता है। इस सत्यता का पुख्ता प्रमाण भी भोजपुरी सिनेमा ही है। भोजपुरी सिनेमा का इतिहास आज से कहीं अधिक समृद्ध और उन्नत रहा है। आज भोजपुरी सिनेमा उनके सामने कहीं नहीं ठहरती हैं।
बात भोजपुरी सिनेमा के इतिहास की चली है तो एक नजर उधर ठहर ही जाती है। मन विह्वल होने के साथ ही समृद्धि की उस विराटता के सामने नत-मस्तक हो जाता है। भोजपुरी सिनेमा के निर्माण काल वैसे तो अपने आप में बहुत ही रोचक है, मगर निर्माण की प्रेरणा हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने दिया था जिनको बहुत ही प्यार से राजेन्द्र बाबू भी कहा जाता है। बात सन् 1962 की है। बात यह हुई कि किसी समारोह में बाबू राजेन्द्र प्रसाद से उत्तर-प्रदेश के जिला गाजीपुर के मूल निवासी नाजिर हुसैन से हुई। वे मुंबई हिन्दी फिल्मों के निर्देशक एवं अभिनेता भी थे। साथ ही धनबाद के झरिया में कोयला खदान के मालिक विश्वनाथ शाहाबादी से भी मुलाकात हुई। उसी समय राजेंद्र प्रसाद ने भोजपुरी सिनेमा के निर्माण करने की बात कही। इन दोनों के अथक प्रयास से पहली भोजपुरी फिल्म का निर्माण हुआ जिसका नाम था ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’। इसके निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी। निर्देशक कुन्दन कुमार, गीतकार शैलेन्द्र, संगीतकार चित्रगुप्त नायक असीम कुमार और नायिका कुमकुम थे। साथ ही नज़ीर हुसैन और रामायण तिवारी भी दमदार भूमिका में थे। उसके बाद 1964 में ‘बिदेसिया’ बनी। जनवरी 1961 में नज़ीर हुसेन के नेतृत्व में ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ फिल्म का निर्माण शुरू हुआ। कुन्दन कुमार को, जो बनारस के थे, निर्देशक की जिम्मेदारी सौंपी गयी। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर भोजपुरी की पहली फिल्म का मुहूर्त संपन्न हुआ। यह फिल्म अद्भुत रूप से सफल हुई। कर्णप्रिय धुनों में गूँथे ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो..’, सोनवा के पिंजरा मंे बंद भइल हाय राम…’, ‘काहे बँसुरिया बजवल….’ जैेसे इस फिल्म के गीतों से पूर्वोत्तर भारत का गाँव-गाँव गूँज उठा। पाँच लाख की पूँजी से बनी इस फिल्म ने लगभग 75 लाख का व्यवसाय किया। इसके बाद तो भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गई। 1961 से 1967 के बीच ‘बिदेसिया’, ‘लागी नाही छूटे राम’, ‘नइहर छूटल जाय’, ‘हमार संसार’, ‘बलमा बड़ा नादान’, ‘कब होइहें गवनवा’….‘सोलहो सिंगार करे दुलहिनिया’ बनीं। इसी दौर में ‘कमसार फिल्म्स’ के बैनर तले नज़ीर हुसैन की फिल्म ‘हमार संसार’ भी आई। एक फिल्म ‘मितवा’ प्रदर्शित हुई। 1970 में उत्तर प्रदेश और 1972 मंे बिहार में प्रदर्शित हुई। लंबे अंतराल के बाद भोजपुरी फिल्मों का रंगीन दौर शुरू हुआ। भोजपुरी फिल्म निर्माण यह दौर 1977 से 1982 तक चला। ‘दंगल’, ‘बलम परदेसिया’, ‘धरती मइया’, और ‘गंगा किनारे मोरा गाँव’, ‘सजनवा बैरी भइले हमार’ जैसी फिल्मों की सफलता ने यह स्थापित किया की भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग है। पहले दौर में ‘बिदेसिया’ जैसी हिट फिल्म के निर्माता बच्चूभाई शाह ने भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म ‘दंगल’ (1977) बनाई। फिल्म के पात्र और कथा लगभग वही थी। लेकिन रंग के अलावा मिस इंडिया प्रेमा नारायण भी इस फिल्म में अतिरिक्त आकर्षण थी। यह वह समय है जब भारतीय फिल्म फलक पर ‘शोले’ आकर जा चुकी थी। दंगल में ‘शोले’ की तर्ज पर घोड़े पर सवार डकैतों का पकड़ने का लंबा चेज सीन था। डाकू का नाम ‘कालिया’ था जो संवाद अदायगी में विशिष्ट शैली अपनाता है। उसकी डेन शोले के गब्बर से कम नहीं थी। ‘भेड़ों की लड़ाई’ और ‘कुश्ती’ जैसे खास स्थानीय ‘तमाशा’ की चीजें डाली गई थीं। नदीम-श्रवण की जोड़ी का ताजातरीन संगीत था। ऐसा कहा जाता है कि नदीम-श्रवण का परिचय भी फिल्मी दुनिया को इसी फिल्म की बदौलत हुआ। फिल्म हिट रही। ‘दंगल’ की सफलता के बाद नज़ीर हुसैन ने ‘कमसार फिल्म्स’ के अपने बैनर तले पूना फिल्म इंस्टीटयुट से अभिनय के स्नातक राकेश पांडेय को लेकर ‘बलम परदेसिया’ नाम की फिल्म बनाई। लास्ट एंड फाउंड फारमूले की इस फिल्म ने रजत जयंती मनाई। इसमें चित्रगुप्त का संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोला। मो. रफी की आवाज में ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ि-उड़ि जाये…’ से भोजपुर की गलियाँ गुलजार हुईं। हालाँकि भोजपुरी बाजार की हालत नरम देखकर नज़ीर साहब ने बहुत कम दामों पर ही उसके राइट बेच दिये थे।
भोजपुरी सिनेमा ने अपनी यात्रा में भोजपुरी की सुरमयी शाम देखी है, मँहकती महुआबारी की भोरहरिया देखी है, किलकारियाँ भरते सूर्योदय को देख है, जवान होती दोपहरी को देखी है।
भोजपुरी सिनेमा ने अपने सफर में सोहर की किलकारी को सुना है, सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी है। वैवाहिक विधानों को सीखा है। खेत में काटे गए धान-गेहूँ के बोझे को ढोया है, बैलगाड़ी से गन्ने को मील में पहुँचाया है। केले की बगान देखी है, आम का टिकोरा तोड़ा है। तरकूल के पेड़ से ताड़ी उतारी है, नाव पर नदी पार किया है। मछली पकड़ने के लिए जाल फेंका है, किसी घसगरिन्ह को छेड़ा है और लहलहाती फसलों में झूमा है। सारे रश्म-ओ-रिवाज़, सारे दस्तुरों और सभ्यता-संस्कृति, सारी गोतीया-दयाद आदि से दर्शकों का परिचय कराने वाली भोजपुरी फिल्में आधुनिकता के आवरण में भी नहीं दिखती हैं। दिखती हैं तो अनेक आइटम नंबरों में कुछ द्विअर्थी और कुछ अनुवादित संवाद का खज़ाना। भोजपुरी सिनेमा के सफर को देखते वक्त ध्यान आता है कि नज़ीर साहब द्वारा बहुत कम दामों पर ही अपनी फिल्म का राइट बेच दिये के बाद आरा के रहनेवाले सिनेमा वितरक अशोक चंद जैन की फिल्म ‘धरती मइया’ ने स्वर्ण जयंती और ‘गंगा किनारे
मोरा गाँव’ ने हीरक जयंती मनाई। यह फिल्म पटना के अप्सरा सिनेमा हाॅल में 30 सप्ताह तक चली। इस फिल्म ने 50 लाख रूपये का व्यवसाय किया। मुंबई के मशहूर सिनेमा हाॅल ‘मिनर्वा‘ में चार सप्ताह तक हाउसफुल चली। ऐसा दावा किया जाता है कि भोजपुरी फिल्म की यह पहली है जिसका प्रदर्शन माॅरीशस में हुआ और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के लिए इसका चयन किया गया। 1983 में मोहनजी प्रसाद ने ‘हमार भौजी’, 1984 में राज कटारिया की ‘भैया दूज’, 1985 में लालजी गुप्त की ‘नइहर की चुनरी’ और मुक्तिनारायण पाठक की ‘पिया के गाँव’, 1986 में लक्ष्मण शाहाबादी की पत्नी रानी श्री द्वारा प्रस्तुत ‘दूल्हा गंगा पार के’, ने भोजपुरी फिल्मों का व्यवसाय बढ़ाया। भोजपुरी सिनेमा के रजत जयंती वर्ष 1987 मेें मुक्तिनारायण पाठक की फिल्म ‘पिया के प्यारी’ आई। जिसका गीत ‘अँगुरी में डँसले बिया नगिनिया रे, हे सखी सैंया के बोलाइ दऽ’ शोहरत और सफलता का कारण बना। नब्बे का दशक भोजपुरी फिल्मों के सन्नाटे का दौर रहा है। 1993 में आकाश जोगी की फिल्म ‘महुआ’ को लोगों ने खारिज कर दिया।
अब धीरे-धीरे फिर से भोजपुरी सिनेमा का दौर आने वाला था। अब शायद तूफान से पहले की शांति थी। बात सन 2000 की है। उसके बाद एक बार फिर से भोजपुरी फिल्मों में उछाल आया है। इस नये उभार के अगुआ निर्माता-निर्देशक मोहन जी प्रसाद माने जाते हैं। फिलहाल ‘सैंया हमार’, ‘सैंया से करि द मिलनवा हे राम’ और ‘गंगा जइसन माई हमार’ जैसी फिल्मों के जरिये वे दर्शकों को एक बार फिर से सिनेमा हाॅल में बुलाने मे सफल रहे हैं। इस दौर में बरसों बाद सुजीत, राकेश पाण्डेय, कुणाल सिंह के बाद रवि किषन जैसा नायक भोजपुरी को मिला है। भोजपुरी फिल्मों के इस नये दौर पर स्थानीय मीडिया में भी चहक आ गया। इस नए दौर के उत्कर्श का ही परिणाम था कि विश्वनाथ शाहाबादी के बेटे भी फिर से अपेक्षाकृत बड़े बजट की फिल्म लेकर आये हैं ‘गंगा जइसन पावन पिरीतिया हमार’। हाजीपुर के सुनील बूबना ने भोजपुरी में और अधिक बड़े बजट वाली फिल्म ‘सोहागन बना द सजना’ हमार लेकर आए।
अपनी बात को आगे बढ़ाने से पूर्व अगर ईमानदारी से देखा जाए तो शुरूआती 14 वर्षों में तो भोजपुरी फिल्म निर्माण की ज़मीन तैयार हुई थी क्योंकि 1948 से
प्रारंभिक कार्यों को तो केवल नींव ही कहा जा सकता है। उस नींव की ईंट में मोती बी.ए. जैसे लोगों से अपना महवपूर्ण योगदान दिया है। तब भी आज भोजपुरी सिनेमा 50 साल से अधिक का प्रौढ़ हो चुका है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर भी इसमें प्रौढ़ावस्था वाली गंभीरता नहीं दिख रही है। जैसे-जैसे इसकी उम्र बढ़ी है, लड़कपन बढ़ता गया है। लड़कपन की स्वछंदता और अज्ञानता झलकने लगी। वर्तमान समय में तो ऐसा लगता है कि इसे समय और इतिहास कभी माफ नहीं कर सकेंगे। अब तो इस पर ये कहावत भी चरितार्थ हो रही है कि जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। मैं किसी न किसी बहाने सन 2002 से भोजपुरी सिनेमा से जुड़ा हूँ। अनेक कलाकारों से मिला हूँ तथा उनके विचारों को भी सुनने का मौका मिला है। मगर सोचने की बात यह है कि अपने पास सब कुछ उत्कृश्ट होने के बाद भी भोजपुरी सिनेमा में सीने की आग को ही भड़काने को अपना मुख्य लक्ष्य क्यों समझा जाता है?
जब फिल्म जगत में भोजपुरी के प्रवेश की बात आती है तो पता चलता है कि प्रवेश का माध्यम भोजपुरी गीत ही रहे और इसका श्रेय उत्तर-प्रदेश के देवरिया जनपद के सरयू की गोद में बसा कस्बा बरहज के मोती, मोती बी.ए. को जाता है। सन 1948 में एक फिल्म बनी ‘नदिया के पार’। उस फिल्म के निर्देशक थे किशोर साहू। वह फिल्म मछुआरों और मल्लाहों की जिंदगी पर आधारित थी, जिसके संवाद अवधी में थे और उसमें आठ गीत भोजपुरी में थे। इसमें से अधिकांश गीत दिलीप कुमार और कामिनी कौशल पर फिल्माये गये थे। उन गीतों को मोती बी.ए. ने लिखा था। असर यह हुआ था कि उन गीतों ने लोकप्रियता के नए रिकार्ड बना डाले। ‘फिर से आइल महुआबारी में बहार सजनी’ गीत तो सबके जुबान पर मिस्री की तरह फिरने लगी। फिर क्या था, लोगों को भोजपुरी गीतों का चस्का लग गया और इसके साथ ही हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीत रखे जाने का रिवाज चल गया। सोचने की बात यह है कि आज के गीत कहाँ हैं? आज तो यह आलम है कि कभी किसी रियालिटी शो आदि में कभी भोजपुरी का गीत बजता है तो किसी उपहास के प्रसंग में। आज भोजपुरी गीतों में फूहड़ता का जो भरमार है, उससे लोकप्रियता तो दूर, केवल पगड़ी उछलेगी।
समय का चक्र चलता रहा और भोजपुरी सिनेमा की गति तेज हो गई। सन् 2003 में मनोज तिवारी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसावाला’ के सुपर-डुपर हिट होने के बाद भोजपुरी सिनेमा को तो जैसे पंख लग गया। हम 2003 के बाद के समय को भोजपुरी सिनेमा का नव-युग कह सकते हैं। तो ‘ससुरा बड़ा पैसावाला’ के समय मोहन जी प्रसाद ने रवि किशन को लेकर ‘सैया हमार’ और ‘सैया से कर द मिलनवा हे राम’, दो फिल्में बनायी। दोनों फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया लेकिन मोहन जी प्रसाद की ही अगली फिल्म ‘पंडित जी बताईं ना बियाह कब होई, ने फिर से भोजपुरी सिनेमा को व्यावसायिक रूप से तेज गति दी। फिर तो भोजपुरी सिनेमा की किस्मत ही जाग गयी। अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जूही चावला, मिथुन चक्रवर्ती, नगमा, ग्रेसी सिंह, भाग्यश्री जैसे हिंदी के नामी
अभिनेताओं ने भोजपुरी फिल्मों में काम किया। भोजपुरी फिल्मों का बजट बढ़ गया और इसकी शूटिंग लंदन, माॅरिशस और सिंगापुर में
होने लगी। इस दौरान हिंदी के कई बड़े निर्माता-निर्देशक सुभाष घई, सायरा बानो और राजश्री प्रोडक्शन जैसे ग्रुप भोजपुरी फिल्में बनाने के लिए अग्रसर हुए। रवि किशन और मनोज तिवारी के अलावा भोजपुरी सिनेमा के आकाश पर कई नये हीरो चमके। दिनेश लाल यादव निरहुआ ने अपनी लोक-कलाकार की छवि के साथ ही भोजपुरी सिनेमा के प्रति लोगों को आकर्शित किया। ‘बड़ा जालीदार बा तहार कुर्ती’ से गायन में सफलता का परचम लहराने वाले पवन सिंह आए। पंकज केसरी, विनय आनंद, कृष्णा अभिषेक और नयी नायिकाओं में रानी चटर्जी, नगमा, भाग्यश्री, दिव्या देसाई, पाखी हेगड़े, रिंकू घोष, मोनालिसा, श्वेता तिवारी जैसे कलाकारों की दस्तक से भोजपुरी सिनेमा ने रफ्तार पकड़ लिया। इसी समय में कल्पना जैसी गायिका भी उभर कर आयी। सन! 2010 में मनोज तिवारी की फिल्म भोजपुरिया डॉन को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में आमंत्रण मिला। इन घटनाओं से स्पश्ट होता है कि भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ने लगी। साथ ही धीरे-धीरे फूहड़ता पर भी चर्चा होने लगी। अब दर्शक भी जागरूक होने गले। भोजपुरी अस्मिता के साथ हो रहे खिलवाड़ को दर्शक नकारने के साथ ही विरोध भी व्यक्त करने लगी। वर्श 2011 भोजपुरी सिनेमा के स्वर्णिम वर्ष के रूप में मनाया गया। जगह-जगह भोजपुरी फिल्म अधिवेशन, भोजपुरी फिल्म अवार्ड तो भोजपुरी सिटी सिने अवार्ड का आयोजन हुआ। पूरे साल भोजपुरी फिल्म का उत्सव होता रहा। हर जगह भोजपुरी से जुड़े आयोजनों में अब फिल्म-सत्र भी रखा जाने लगा। अभिनेता मनोज तिवारी ‘मृदुल’, रवि किषन, अभिनेत्री नगमा जैसे भोजपुरी फिल्मों से जुड़े अनेक दिग्गज राजनीति में भी हाथ आजमाये। उनमें से मनोज तिवारी ‘मृदुल’ आदि सफल भी हुए। अब सबके समझ में आ गया कि भोजपुरी सिनेमा में असीमित संभावनाएँ हैं।
सभी मानते हैं कि भोजपुरी सिनेमा में संभावनाएँ असीमित हैं मगर क्या कोई इसकी चिंता कर रहा है? क्या भोजपुरी सिनेमा के लिए साहित्य और सिनेमा समाज के दर्पण नहीं हैं? क्या यहाँ बड़े-बड़े निर्माताओं की कमी है? कया यहाँ मनोज तिवारी, कल्पना, उदित नारायण, दिनेश लाल जैसे बेहतरिन गायकों की कमी है? क्या यहाँ रवि किशन, दिनेश लाल, राकेश पाण्डेय जैसे नायकों की कमी है? ……. अगर ईमानदारी से पूरी फिल्म इंडस्ट्री की बात की जाए तो एक बड़ा भोजपुरिया हिस्सा मुम्बई सिनेमा को जीवित रखा हुआ है, तब इस हाल में क्या हमारा अपने देश, समाज, अपनी सभ्यता, संस्कृति के प्रति कोई कर्तव्य नहीं बनता? क्या कारण है कि शारदा सिन्हा के बाद मालिनी अवस्थी को छोड़कर कोई पारंपरिक गीतों को गाना नहीं चाहता? क्या कारण है कि आज सब भोजपुरी के पितामह तो कहलाना चाहते हैं, मगर सिर्फ असंख्य संस्थाओं में ही उलझकर रह जाते हैं? क्या भोजपुरी सिनेमा के लिए कभी अपनी मिट्््््््््््््टी से जुड़ा जमाना नहीं आएगा? क्या वास्तव में गुजरा हुआ ज़माना दुबारा नहीं आता? न सरकारें मान्यता की चिंता कर रहीं हैं और न हम ही इसकी मान की चिंता करेंगे, तब भोजपुरी का क्या होगा? एक बार अवश्य सोचिए। भोजपुरी जीते हैं, भोजपुरी की खाते हैं। भोजपुरी माँ है। तो माँ की चिंता कौन करेगा? भोजपुरी सिनेमा के उस भड़काऊ आग को शांत करना होगा नही ंतो मन को मथता आग कहीं ज्वालामुखी बनकर फट न जाए।

Leave a Comment