मारीशस जैसा मैने जाना

मारीशस के बारे में मार्कट्वेन का प्रसिद्ध कथन कि ईश्वर ने पहले मारीशस बनाया फिर उसकी नकल पर स्वर्ग बनाया, बार-बार दुहराया जाता है। मारीशस की प्राकृतिक शोभा और सामाजिक व्यवस्था इस कथन की पुष्टि करती है। यह मारीशस नाम का स्वर्ग बना कैसे ? किन लोगों ने बनाया ? मारीशस की अधिकांश आबादी भारतीय मूल की है। उसमें भी भोजपुरी मूल के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। यह आबादी 18 वीं शती में शर्तबन्द मजदूरों के रूप से लायी गयी दुनिया से गुलाम प्रथा की समाप्ति के बाद हुक्मरानों को इसके विकल्प की तलाश करनी थी। प्दकमदजनतमक स्ंइवनत की प्रथा एक तरह से गुलामी प्रथा का विकल्प थी। इसमें मजदूरों की स्थिति या हैसियत में कोई फर्क नहीं आया था। सिवाय इसके कि वे अब गूलाम नहीं बल्कि प्दकमदजनतमक स्ंइवनत थे। उनकी यातना वैसी ही थी। वे पशुओं की तरह जहाजों में भर कर ले जाये गये और पशुओं की ही तरह उन्हें रखा गया। अपना देश, अपना इलाका, अपना घर सब पीछे छूट गया था। उनसे कहा तो गया था कि गंगा के उसपार चलना है पर उन्हें हिन्द महासागर के पार ले जाया गया। अजनवी भूमि, अजनवी लोग और अपार यातना के बीच ये लोग अपनी जिजीविषा के बल पर जीवित रहें। इस जीवन क्रम में उन्होंने अपने को नये सिरे से परिभाषित किया। नये सिरे से खड़े हुए। संघर्ष किया और आज यहाँ गिरमिटिया से गवर्नमेण्ट बने और मारीशस को धरती का स्वर्ग बनाया। गिरमिटिया से गवर्नमेन्ट होने के बावजूद मारीशस में भारतीय मूल के लोगों में उस पीड़ा की स्मृति बनी हुई है जो उनके पुरुखों ने झेली थी। मारीशस के भारतवंशियों के मन में अपने पुरुखों के पीठ पर पड़े औपनिपेशिक कोड़ों की टीस बनी हुई है। यह टीस ही मारीशस के भारतवंशियों को खास बनाती है।
भारत में मौजूद वर्ण जाति की चेतना जहाजी भाइयों के बीच कहीं खो गई और वे भारतीय और भोजपुरिया जैसी पहचान के साथ रह रहे हैं। मारीशस में भारतीय मूल के लोगों के नाम में जाति सूचक उपाधियाँ नहीं लगाई जाती। इसकी जगह मारीशस पहुँचे अपने पहले पुरखे का नाम लगाने का चलन है। शिवसागर रामगुलाम, अनिरुद्ध जगन्नाथ, जगदीश गोवर्धन, सरिता बूधू, मुखेश्वर चुन्नी जैसे नामों में रामगुलाम, जगन्नाथ, गोबर्धन, बूधू और चुन्नी उस व्यक्ति का नाम है जो मारीशस पहुँचने वाला पहला शख्स था। शर्तबन्द श्रमिक के रूप में ले जाये गये इन भारतवंशियों के लिए अन्तिम उपाय उनका श्रम था। यातना से बचने का उपाय उनके श्रम में ही था। श्रम और केवल श्रम। श्रम उनके लिए कवच भी था और मुक्ति का उपाय भी। इस तरह इन भारतवंशियों के मन में नये तरह की श्रम संस्कृति ने जन्म लिया। जातियों के घुल जाने तथा श्रम की नयी संस्कृति ने मारीशस के भारतवंशियों को वह क्षमता प्रदान की जिससे वे धरती के स्वर्ग की रचना कर सके।
दो नवम्बर मारीशस के इतिहास का अहम दिन है। भारत से गिरमिटिया मजदूरों की पहली खेप लेकर पानी का जहाज मारीशस के पोर्ट लुई  बन्दरगाह पर दो नवम्बर 1834 के दिन पहुँचा था। इन गिरमिटिया मजदूरों को उनके अंग्रेज मालिकों ने बेहद हसीन सपने दिखाये थे। उन्हें बताया गया था कि मारीच द्वीप पर विशाल काय चट्टानों के नीचे सोना है। उन्हें वहाँ चट्टानों को हटाकर सोना निकालना है। रामकथा के बेहद अहम पात्र मारीच से मारीशस नाम के ध्वनि साम्य ने इस सपने को और रंगीन बना दिया होगा। रावण का मामा मारीच सोने का मृग बन कर सीताहरण का कारण बना था। सोने का मृग बन जाने वाले मारीच के देश में सोना होगा ही। सोना मिलने और भावी जीवन के सवर जाने का सपना पाले छब्बीस गिरमिटिया मजदूर समूचा हिन्द महासागर पार कर के मारीशस की यातनादायी यात्रा के बाद पोर्ट लुई बन्दरगाह पर उतरे। वहाँ सोलह सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद कर बिल्कुल अजनबी भूगोल पर अपने को पाया। वहाँ आते ही जिस तरह उनका स्वागत किया, गया उन्हें आने वाले कठिन बीहड़ जीवन का अहसास हो गया। भले ही वे तीन या पाँच साल के एग्रीमेण्ट पर लाये गये थे लेकिन जल्दी ही उन्हें यह अहसास भी हो गया कि इस यात्रा से वापसी नहीं होने वाली है। इस अजनबी जमीन पर यातनाओं का अटूट सिलसिला उनका इन्तजार कर रहा था। सबसे बड़ी यातना थी अपनी मूल भूमि से सदा सदा के लिए विस्थापित होने का भाव। गोरे मालिकों के कोड़ों के आतंक में हाड़ तोड़ परिश्रम के साथ उनकीे बाकी जिन्दगी बँध गयी थी। मारीशस की स्मृति में 2 नवम्बर का दिन दरअस्ल इस यातना के आरम्भ की तरह अंकित है। अबकी जिस विश्व भोजपुरी महोत्सव और साहित्य सम्मेलन में शामिल होने हम लोग मारीशस आये वह दरअसल गिरमिटिया मजदूरां के मारीशस आगमन के 180 वर्ष पूरा होने का अवसर था। दो विरोधी भाव तंतुओं से यह स्मृति बन रही थी। पुरखों की पीठ पर पड़ने वाले कोड़ों से उभरने वाली दर्द भरी कराह की वेदना में आज के यथार्थ का स्वाभिमान घुल मिल गया है। मारीशस के राष्ट्रपति राजकेश्वर प्रयाग हों, समूचे आयोजन के सूत्र संचालक वहाँ के संस्कृति मंत्री मुखेश्वर चुन्नी हों, भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन की चेयरपरसन सरिता बूधू हों या फिर भारतीय मूल का कोई भी मारीशसीय नागरिक अनुभूति के दो विरोधी छोर उसकी चेतना में मौजूद हैं। कलकत्ता से छूटल जहाज, पवंरिया धीरे चलऽ’ मारीशस के राष्ट्रीय गीत जैसा है। इस गीत को गाते सुनते हुए किसी भी भारतवंशी मारीशसीय नागरिक के भीतर विस्थापन का दर्द हिन्द महासागर की तरह हिलोरे मारने लगता है। इसके साथ ही हम मारीशसीय भारतवंशी को गर्व से यह करते हुए पा सकते हैं कि हम लोग गिरमिटिया बनकर आये और यहाँ गवर्नमेण्ट हो गये। हम अनुभूति के इन्हीं दो विरोधी छोरों के महासमुद्र में संतरण कर रहे थे।
मारीशस के शिव सागर राम गुलाम हवाई अड्डे से हम बाहर निकले तो हमारी सारी थकान डाॅ0 सरिता बूधू को देखकर ही गायब हो गयी। से हम कुल नौ लोग थे। मेरे साथ प्रोफेसर अवधेश प्रधान, वसिष्ठ नारायण त्रिपाठी, वसिष्ठ द्विवेदी, डाॅ0 महेन्द्र प्रताप, डाॅ0 जान्हवी सिंह, डाॅ0 वन्दना शाही, तथा शैलेन्द्र थे। भोजपुरी केन्द्र के पोस्ट डाक्टोरल फेलो अजित कुमार राय पहले ही पहुँचे चुके थे। बाद में प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह और त्रिपुरा के डाॅ0 विनोद मिश्र भी हमलोगों से जुड़ गये। सरिता जी ने जिस आत्मीयता से सबका स्वागत किया, उसका बयान न तो वे गुलदस्तें कर सकते थे जो हमें दिये गये और न ही हमारे शब्द। सरिता बूधू भोजपुरी और हिन्दी के लिए भारत और मारीशस एक किए रहती हैं। हिन्द महासागर के दोनों किनारों पर एक साथ उपस्थित होकर वे भोजपुरी-हिन्दी के बहुत बड़े जमात की स्वाभाविक रूप से दीदी यों ही नहीं बन गयी हैं। श्रम, समर्पण, उत्साह, प्रेम और आत्मीयता से लबरेज यह महिला अपने आप जगत दीदी होने का रुतबा हासिल कर लेती है।
हवाई अड्डे से हम लोग कातर बोन के गोल्ड क्रेस्ट होटल लाये गये। मेरी यह मारीशस की तीसरी यात्रा थी। लेकिन हर यात्रा में मैं अपनी तुलना गिरमिटिया मजदूर बन कर आये पुरुखों से करता हूँ और उनके अथाह धैर्य के सामने हर बार नतमस्तक होता हूँ।
औपचारिक कार्यक्रम 29 अक्टूबर से शुरू होना था। हम लोग तीन दिन पहले ही वहाँ पहुँच गये थे। भाव यह भी था कि दो तीन दिन मारीशस के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखा जाये।
27 अक्टूबर को समूचे आयोजन के बारे में संस्कृति मन्त्री मुखेश्वर चुन्नी की प्रेस कान्फ्रेन्स थी। पोर्ट लुई के होटल लेबडोनोय में। आलीशान और बेहद खूबसूरत होटल से इस यात्रा में हमारा साबका कई बार पड़ना था। बहरहाल प्रेस कान्फ्रेंस में हम सभी लोग शामिल हए। गिरमिटिया मजदूरों के मारीशस आगमन के एक सौ अस्सी वर्ष पूरा होने को याद किया जा रहा था। इसमें बहुतेे कार्यक्रम थे। 29 अक्टूबर से 5 नवम्बर तक आयोजनों का सतत सिलसिला था। विश्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन, विश्वभोजपुरी महोत्सव तथा भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के साथ अन्तरराष्ट्रीय डायस्पोरा कान्फ्रेन्स भी आयोजित था। 29 अक्टूबर की शाम हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन था तो 30 अक्टूबर की शाम भोजपुरी सम्मेलन का। इन्दिरा गांधी केन्द्र में हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन वहाँ के राष्ट्रपति श्री राजकेश्वर प्रयाग ने किया। उद्घाटन समारोह में तीनों ही सम्मेलनों के प्रतिनिधि मौजूद थे। भोजपुरी सम्मेलन में उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे विधान सभा अध्यक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय तथा उत्तर प्रदेश सरकार में विकलांग कल्याण मन्त्री श्री अम्बिका चैधरी भी मौजूद थे। हिन्दी सम्मेलन की मुख्य विषयवस्तु डायस्पोरा देशों में हिन्दी शिक्षण पर केन्द्रित थी। इसलिए प्रायः ऐसे ही लोग आमन्त्रित किए गये थे तो इन देशों में हिन्दी की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से किसी न किसी तरह जुड़े हुए थे। हमारे होटल में पहले दिन फिजी से आस्ट्रेलिया/कनाडा गयी सुनीता नारायण और फिजी में हिन्दी शिक्षण कर रही मिली। यह अत्यन्त विकट स्थिति में पूरी दुनिया में हिन्दी शिक्षण कर रहे लोगों के जज्बे को सलाम करने का दिन था। हिन्दुस्तान में जहाँ सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं और सुविधायें भी, वहाँ अंगे्रजी के सामने जैसे हमने हथियार डाल दिये हैं। ऐसे में धुर अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पेनिश वर्चस्व के बीच हिन्दी का प्रदीप जलाने रखने वाले लोगों के सामने नतमस्तक हुए बगैर नहीं रहा जा सकता था।
30 तारीख की शाम को महात्मागांधी संस्थान के सभागार में भोजपुरी सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन था। औपचारिक उद्घाटन इसलिए कि भोजपुरी के तकनीकी सत्र 30 तारीख को सुबह से ही शुरू हो गये थे। महात्मागांधी संस्थान के सभागार में भोजपुरी विभाग में भोजपुरी भाषा के हजार वर्ष के इतिहास पर दिन भर की चर्चा हो चुकी थी। सम्मेलन स्थल पर संभावना कला मंच तथा जन भोजपुरी मंच की ओर से भोजपुरी के हजार बरिस पर पोस्टर प्रदर्शनी आकर्षण का केन्द्र बनी हुई थी। भोजपुरी सम्मेलन के औपचारिक उद्घाटन भी राष्ट्रपति महोदय ने ही किया। विश्वभर से आये सभी प्रतिनिधि इसमें भी उपस्थित थे। राष्ट्रपति महोदय ने दोनों उद्घाटन वक्तव्य में हिन्दी और भोजपुरी को दिल की भाषा बताया।
यहीं पर मारीशस में भोजपुरी और हिन्दी की स्थिति पर थोड़ी चर्चा कर लेना उचित होगा। यह सही है कि वहाँ भोजपुरी की अपेक्षा हिन्दी ज्यादा चलन में है। इसकी वजह यह रही कि काफी पहले से आर्य समाज जैसी संस्थाएँ हिन्दी के प्रचार प्रसार में सक्रिय रही हैं भारत की राष्ट्रभाषा होने के नाते भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय से हिन्दी के प्रचार प्रसार तथा विकास के यत्न भी पहले से होते रहे हैं। फ्रेंच और अंग्रेजी वहाँ ज्ञान विज्ञान की भाषा है तो क्रियोल बोल चाल की है। अंग्रेजी और फ्रेंच के वर्चस्व तथा क्रियोल की सहज उपस्थिति के बीच हिन्दी को प्रचलित और स्थापित करने के पीछे हिन्दी सेवियों का भारी योगदान है। मारीशस में हिन्दी के लिए कितना प्रयत्न हुआ इसका अन्दाज इस बात से भी लगता है कि विश्व हिन्दी सम्मेलनों का सिलसिला चल निकला और विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित करने की बात आती तो मारीशस उसका स्वाभाविक दावेदार सिद्ध हुआ।
हिन्दी रेडियो, टेलीविजन और हिन्दी फिल्मों ने भी हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में विशेष भूमिका निभाई। फ्रेंच, अंग्रेजी और क्रियोल के बावजूद मारीशस में मनोरंजन की भाषा के रूप में निर्विवाद रूप से हिन्दी की जगह है।
लेकिन यह भी सच है कि मारीशस में हिन्दी का अस्तित्व इसलिए है कि यहाँ भोजपुरी भाषियों की संख्या भरपूर है। भोजपुरी बेशक मारीशस के नयी पीढी की भाषा नहीं  है लेकिन दादी और नानी बाबा और दादा की बोली के रूप में भोजपुरी वहाँ की स्मृति में कायम है। खास तौर से जीवन के विविध संस्कारों के अवसर पर जुड़े लोकगीतों और लोक परम्पराओं में भोजपुरी घुली मिली है। मारीशस की हिन्दी के मूल में वहाँ के भोजपुरी भाषी जन हैं आकड़े बताते हैं कि भारत से मारीशस में हुए प्रवासन में भोजपुरिया इलाके से आये लोगों की संस्था सबसे अधिक थी। इसलिए केवल भारतवंशियों में ही नहीं बल्कि मारीशस में रहने वाली दूसरी जातियताओं में भी भोजपुरी का प्रसार स्वाभाविक रूप से हुआ शायद इसीलिए 2009 में हुए विश्व भोजपुरी सम्मेलन का मुख्य नारा ही था- भोजपुरी हमार माँ।’ यह मातृभाषा के अर्थ में तो था ही इसके मूल में कही न कहीं यह बात थी कि भोजपुरी से ही हिन्दी है। कम से कम मारीशस के बारे में यह पूरी तरह सच है।
पहली बार मारीशस गये हमारे कुछ मित्रों को इस बात से बड़ी निराशा हुई कि मारीशस में भोजपुरी उस तरह से नहीं बोली जाती जैसा उन्होंने सोच रखा था। कुछ अति उत्साही या बड़बोले भोजपुरीवादियों ने भारत में यह भ्रम फैला रखा है। जैसे मारीशस मूलतः भोजपुरी भाषी देश हो। इस तरह के अर्ध सत्य से प्रभावित मन को मारीशस में भोजपुरी की स्थिति देखकर सचमुच निराशा होगी। खास तौर से तब जब हम भोजपुरी आन्दोलन से जुड़े और भोजपुरी के लिए जीने मरने वाले लोगों को आपस में भोजपुरी की जगह क्रियोल मेें बात करते हुए पाते हैं।
लेकिन इससे जल्दबाजी में कोई नतीजा निकालने की गलती न करें। मारीशस में भोजपुरी का मसला एकदम से अलग है। वहाँ भोजपुरी पहचान की भाषा है। यह पहचान भी इकहरी पहचान नहीं है। यह पहचान है गिरमिटिया से गवर्नमेण्ट बन जाने की दुख साहस और संघर्ष भरी यात्रा की पहचान ।
मुझे यह कहने दीजिए कि मारीशस में भोजपुरी की उस तरह से आवश्यकता नहीं है जैसे कि भारत के भोजपुरी भाषी इलाकों में है। फ्रेंच, अंग्रेजी और क्रियोल से मारीशसीय भारतीय का काम बखूबी चल रहा है। कार्यालयों से लेकर घरों तक। लेकिन मारीशस के भारतवंशसियों की जातीय स्मृति के लिए भोजपुरी की जरूरत है। मारीशस भौतिक रूप से काफी सम्पन्न है। चीनी पर्यटन उद्योग के अलावा वैश्वीकरण के युग में आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र होने के नाते यहाँ भौतिक समृद्धि है लेकिन गिरमिटियाँ मजदूरों की सुखी सम्पन्न सन्तानें अपने पुरखों की यातना को अपने भीतर जीवित रखे हुए हैं। उनके जीवन संघर्ष को अपने भीतर जीवित रखे हुए हैं।
इस यातना और संघर्ष को सुरक्षित रखने के लिए भोजपुरी चाहिए। अपमान, यातना और ग्लानि की यात्रा करते हुए आज गवर्नमेण्ट होने के गर्व को धारण करने के लिए भोजपुरी की जरूरत है। मारीशस की आज की पीढ़ी में इस बात की बेचैनी है कि वे अपनी इन स्मृतियों को भावी पीढ़ी को किस तरह हस्तान्तरित करें।
उन्हें यह समझ में आता हैं कि अपना जातीय इतिहास वे भोजपुरी के माध्यम से ही सुरक्षित रख पायेंगे और भावी पीढ़ी को हस्तान्तरित कर पायेंगे। इसलिए मारीशस के भोजपुरी प्रेमी महज नाम के लिए काम नहीं कर रहे है। उनके लिए भोजपुरी केवल गीत गवनई तक सीमिति नहीं है (हालांकि वे लोग गीत गवाई को भी एक संस्था के रूप में पुनर्जीवित जरूर कर रहे हैं। कम से कम महात्मा गांधी संस्थान से जुड़े युवा शोधकत्र्ता जिस संजीदगी से भोजपुरी के पठन पाठन और पाठ्यक्रम निर्माण से लगे हुए है वह कुछ और ही कहानी कह रहा है।
भारत में यह धारणा है आम है कि भोजपुरी एक गवारूं बोली है इस धारणा के मूल में हमारी औपनिवेशिक दासता है। हमारे औपनिवेशिक प्रभुओं ने हमें यह बात सिरवाई है और हम अभी तक इस सीख से उबर नहीं पाये हैं। जबकि मारीशस में भोजपुरी जातीय गर्व की भाषा हैं। इसलिए मारीशस सरकार ने भोजपुरी को सरकारी भाषा का दरजा दिया और भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन की स्थापना की है। नयी पीढ़ी को भोजपुरी सिखाने की विधियाँ ईजाद की जा रही हैं। कभी कभी लगता है जैसे इजरायल ने हिबू भाषा को नये सिरे से जीवित किया लगभग उसी तरह से मारीशस में भोजपुरी जीवित करने की कोशिश जारी है। महात्मागांधी संस्थान में अरविन्द बिस्सेसर और उनके सहयोगी इस उपक्रम में लगे हुए है। उनकी लगन और समर्पण देख कर ही उत्तर प्रदेश सरकार के मन्त्री श्री अम्बिका चैधरी ने प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर भोजपुरी पाठ्यक्रम तैयार करने के प्रस्ताव को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मदद देने का भरोसा दिया। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि माराीशस के युवा शोधार्थियों ने भोजपुरी शिक्षण को लेकर जो पर्चे पढ़े उसमें कहीं ज्यादा संजीदगी थी। जबकि अधिकांश भारतीय प्रतिनिधियों का भोजपुरी प्रेम और भोजपुरी सेवा मारीशस पहुँच कर ही पूरा हो गया था। भोजपुरी को लेकर हीनता गं्रथि भोजपुरी के तथा कथित भीष्मपितामहों में भी मौजूद है। भोजपुरी में कोई ठोस काम करने के बजाय वेष भूषा और अपने लिए सम्मान जुटाने पर लोगों का अधिक जोर है। पूरे महोत्सव के दौरान भोजपुरी प्रतिनिधियों ने किसी भी महत्वपूर्ण शख्शियत के साथ फोटो खिचाने के लिए जो धक्का मुक्की की वह शर्मसार कर देने वाला अनुभव था। मारीशस के किसी मन्त्री या राष्ट्रपति के साथ फोटो खिंचाना हो या फिर मारीशस में भारत के राजदूत के साथ धक्का मुक्की एकरस थी। लोक गायिका मालिनी अवस्थी फोटो खिचवाने वालों की धक्का मुक्की से बेहद दुखी और नाराज दिखीं।
5 नवम्बर को हमें वापस जाना था। हमारे सम्मान में राष्ट्रपति महोदय ने स्टेट हाउस में चाय रखी थी। सबकुछ शानदार था, पर फोटो खिंचाने की इस धक्का मुक्की ने हमें शर्मशार कर दिया था। आम तौर पर शांत रहने वाले राष्ट्रपति महोदय के चेहरे पर भी खीझ के भाव उभर गये थे। पर हम भी क्या करते। भोजपुरी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित या कलंकित करने का हमारा अपना मौलिक तरीका था। जिससे आगे हम लाचार थे।
भारत के भोजपुरी पुरोधाओं में एक ही साथ बड़बोलापन और दयनीयता का भाव भरा हुआ था और जगह-जगह फफाकर गिर रहा था। इसी दृश्य को देखकर किसी विदेशी प्रतिनिधि ने मुझसे कहा कि मुझे अब समझ में आया कि भारत में भोजपुरी आठवीं अनुसूची में क्यों नहीं शामिल हो सकी। उनका आशय शायद यह था कि दयनीयता और बड़बोलेपन के नाते भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए गंभीर प्रयास नहीं हो पा रहा है।
बहरहाल, भोजपुरी और हिन्दी सम्मेलन के बाद दो नवम्बर की तारीख आयी। भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने प्रवासी घाट पर हुए आयोजन का उद्घाटन किया अपने प्रभावशाली व्याख्या में उन्होंने इस तारीख के महत्वपर बातें की और मारीशस के लिए बहुत सारी सहूलियतों की भी घोषणा की। सुषमा स्वराज ने भाषण के अन्त में मारीशस के लेखक अभिमन्यु अनत के उपन्यास का अंश उदघृत करके पूरे माहौल को भावुक बना दिया। इसके बाद ही सुश्री सुषमा स्वराज के सम्मान में उसी लेबडोनायक होटल में दोपहर का भोजन आयोजित था। बी. एच. यू. के प्रति निधिमण्डल का नेता होने के बाते मुझे उन गिने चुने लोगों में शामिल होने का अवसर मिला जो विदेश मंत्री की मेज साझा कर रहे थे। हाॅलाकि औपचारिकताएँ ऐसी थीं कि यहाँ सुषमा स्वराज जी को हम निकट से देख तो पा रहे थे पर उनसे बात-चीत का अवसर नहीं था। मेरे सामने की मेज पर विदेश मंत्रालय के बेहद प्रभावशाली सचिव सैयद अकबरूद्धीन बैठे हुए थे। हालिया इराक संकट के समय में टेलीविजन पर अकबरूद्धीन को सुनता रहा हूँ। तभी से उनके  वक्त्तत्व कौशल का प्रशंसक हूँ। खाना खत्म करने के बाद उनसे मिलने से अपने को रोक नहीं पाया। मैंने पाया कि वे जितने प्रभावशाली हैं उतने ही सभ्य और सुसंस्कृत भी। भारतीय व्यूरोक्रेसी में ऐसा संसुस्कृत रूप देखने को कम मिलता है। मैंने उनसे भोजपुरी डायस्पोरा चेयर के अपने प्रस्ताव के बारे में चर्चा की। बी. एच. यू. के प्रतिनिधिमण्डल के बारे में बताया। मैंने श्री अवधेश प्रधान की ओर इशारा किया जो अभी खाना खा रहे थें। मुझे यह देखकर इन्तिहाई खुशी हुई कि सैयद अकबरूद्धीन बिना समय गवायें उस मेज तक गये जिस पर प्रोफेसर अवधेश प्रधान तथा शैलेन्द्र थे उनसे परिचय प्राप्त किया। विदेश मन्त्री श्रीमती सुषमा स्वराज से हमारी भेट जल्दी ही हो गयी। तीन नवम्बर को श्रीमती सुषमा स्वराज ने महात्मा गाँधी संस्थान में डायस्पोरा कान्फरेन्स का उद्घाटन किया। उद्घाटन के बाद जब वे लौट रही थीं उसी समय मेरी उनसे कुछ क्षणों की मुलाकात हुई। मैंने बिना अवसर गवायें भोजपुरी डायस्पोरा चेयर के प्रस्ताव के बारे में बताया जिसे उन्होंने गौर से सुना। इसके बाद हम लोग मारीशस के हिन्दी लेखक श्री रामदेव धुरन्धर के घर गये। इन्तफाक से हमारे ड्राइवर भीम का घर रामदेव धुरन्धर के गाँव में ही था। धुरन्धर जी ने बेहद आत्मीय और अभिभूत करने वाला स्वागत किया। रामदेव धुरन्धर का स्वागत हमारी स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गया। चार नवम्बर को रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान में बिहार गौरव प्रदर्शनी का उद्घाटन था। उद्घाटन करने के लिए फिर मारीशस के राष्ट्रपति मौजूद थे। बिहार गौरव इसलिए कि मारीशस में सबसे अधिक आगम बिहार से ही हुआ है। प्रदर्शनी बेहद श्रम और उत्साह से आयोजित की गई। प्रदर्शनी के बाद हम लोग बी. एच. यू. की पूर्व छात्रा और महात्मा गाँधी संस्थान में हिन्दी की प्राध्यापक संयुक्ता भवन के निमंत्रण पर रात्रि भोज के लिए गये। यह भी बेहद शानदार अनुभव था।
एक शाम हमें भारत के राजदूत श्री मुदगल ने इन्दिरा गाँधी केन्द्र में चाय के लिए आमन्त्रित किया था श्री मुदगल से हमारी बात-चीत हुई। वे भोजपुरी डायस्पोरा चेयर के हमारे प्रस्ताव से न केवल सहमत ये बल्कि आगे बढ़ कर उसे मूर्त रूप देने के लिए अपनी प्रति बद्धता दर्शायी।
कभी इन्दिरा गाँधी ने मारीशस को लघु भारत कहा था। लेकिन मुझे लगता है कि मारीशस को लघुभारत की बजाय अफ्रीकी महाद्वीप में भारत की कलम कहना ज्यादा समी चीन होगा। जैसे कलमी आम मूल आम से बेहतर होता है वैसे ही यह कलमी भारत मूल भारत से कई मामलों में बेहतर हैं।
हम जब भी देश से बाहर जाते हैं तो या तो हीनता ग्रन्थि से ग्रस्त रहते हैं या फिर विश्वगुरु होने के मिथ्या दंभ से। इन दोनों से मुक्त होकर देखें तो हम इस कलमी भारत यानी मारीशस से बहुत कुछ सीख सकते हैं। मसलन जाति से मुक्ति का भाव। हमारे गाइड और ड्राइवर भीम ने दबी जुबान से यह बात बताई कि भारत के लोग उनसे पहली बात जो पूछते हैं वह जाति है। मारीशस से सीखने की बजाय उसे जाति सिखाने की कोशिश करते हैं जो कि वे जहाज में कहीं छोड़ आये थे। दूसरी बात जो हम मारीशस से खीख सकते हैं वह है श्रम का सम्मान। किसी भी तरह के श्रम का संबध श्रेष्ठता और हीनता से नहीं है। हर तरह के श्रम का अपना सम्मान है। यह सम्मान ही मारीशस के व्यक्तियों में सहज बराबरी का भाव पैदा करता है। मन्त्री हो या उसका ड्राइवर उसमें गैर बराबरी जैसा कोई भाव देखने को नही मिला।
हर आदमी अपने कर्तव्य से बँधा है। कोई डाªइवर है इसलिए तुच्छ है और कोई मन्त्री, अधिकारी या प्रोफेसर है इसलिए महान है-ऐसा भाव वहाँ देखने को नहीं मिला। यह अत्यन्त विकसित लोकतान्त्रिक चेतना का मामला हैं। समता के इस फरातल तक पहुँचने के लिए हमारे महान लोकतंत्र को काफी कुछ करना होगा। हम भारतीयों की तुलना में ईश्वर का अंश होने का भाव वहाँ कहीं ज्यादा है। हम लोग खुद का ईश्वर का अंश मानते हैं लेकिन अपने अभीमूल को ईश्वर का अंश मानने में दिक्कत होती है। जहाँ तक मैंने जाना मारीशसीय समाज में इस तरह के पाखण्ड का अभाव हैं। मैं पहुँचने के साथ ही मारीशस के संस्कृति मंत्री श्री मुखेश्वर चुन्नी से मिलने को उत्सुक था। भारत में मारीशस का राजदूत रहते हुए वे भोजपुरी अध्ययन केन्द्र आ चुके थे। मैं उनसे मिलकर भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में शिवसागर रामगुलाम भोजपुरी डायस्पोरा चेेयर स्थापित करने के बारे बात करना चाहता था। श्री मुखेश्वर चुन्नी बेहद सक्रिय उत्साही और खुशदिल इंसान हैं। यह पूरा का पूरा महाआयोजन उनके जिम्मे था। भारत के विदेश मंत्री के आने के नाते वे बेहद व्यस्त थे। उपर से मारीशस में आसन्न चुनावों को दखते हुए उनकी राजनीतिक व्यस्तताएँ व्यक्तिताएँ अपनी जगह थी। प्रेस कान्फ्रेस में उनसे सिर्फ औपचारिक भेट होकर रह गयी। बाद में उनके सहायक ने मुलाकात का समय तय तो करा दिया पर अगले दिन मुलाकात रद्द हो गयी। हिन्दी स्पीकिंग यूनियन के अध्यक्ष श्री राजनारायण गती हम लोगों को हाल लेने होटल आते रहते थे। वे संस्कृति मंत्री के सलाहकार भी हैं। रात में करीब 10 बजे मैने उनसे कहा कि हमारा मंत्री महोदय से मिलना बहुत आवश्यक है। राजनारायन गती ने उसी समय मंत्री महोदय को फोन लगाया और भोजपुरी में ही पूछा-करे सूत गइल हवे। उधर से जो भी कहा गया हो इधर से गती जी ने कहा कि बी. ए. यू. के लोगन के काल मिलेके समय दे दे। और अगले दिन ग्यारह बजे का समय मिल गया। मंत्री और उसके सलाहकार में ऐसी अनौपचारिक वार्ता के बारे में हम भारत में सोच भी नहीं सकते थे।
बहरहाल तय कार्यक्रम के अनुसार भेट हुई और हमने मारीशस सरकार के सहयोग से बी. एच. यू. में शिव सागर राम गुलाम के नाम पर भोजपुरी डायस्पोरा चेयर स्थापित करने के बारे में बात-चीत की और अपना लिखित प्रस्ताव दिया। मुकेश्वर चन्ुनी ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया और भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन के माध्यम से इसे आगे बढ़ाने का वचन भी दिया।
  • प्रो0 सदानन्द शाही

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