मैथिली-भोजपुरी अकादमी द्वारा आयोजित मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल सम्पन्न

दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में मैथिली-भोजपुरी अकादमी द्वारा आयोजित मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन ‘सहोदरी संस्कृति’ शीर्षक से मैथिली और भोजपुरी के भाषिक और सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के सदस्य अजित दूबे ने किया। उन्होंने अकादमी के नाम की सार्थकता को इंगित करते हुए कहा कि शारदा सिन्हा जैसी मैथिली भाषी कलाकार जब भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने की बात करती हैं तब सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत उदाहरण सामने आता है। उन्होंने दोनों भाषाओं से जुड़े वैश्विक घटनाओं का जिक्र करते हुए सांझी विरासत को संजोने की बात कही। कार्यक्रम का संचालन कर रहे अकादमी के कार्यकारी सदस्य मुन्ना कुमार पांडे ने इतिहास की व्याख्या करते हुए बताया कि जब भोजपुरी भाषी देश के लिए लड़ रहे थे तब मैथिली भाषी पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत को संजो रहे थे। अरुणाभ सैरभ ने दोनों भाषाओं की कलाओं में फैल रहे अश्लीलता को दुत्कारा और जमीनजीवी होने की वकालत की। मनोज दूबे ने अकादमी की उपयोगिता को व्याख्यायित करते हुए अस्मिता को बचाने का सबसे बड़ा जरिया बताया। प्रख्यात कवि गुलरेज अहमद ने भोजपुरी भाषी लोगों की खेमेबंदी से बचने और भाषा को लेकर हीन भावना से उठने की जरूरत पर बात रखी। श्री देवेश ने भाषाई शुद्धता को बचाये रखने की बात कही और अनुवाद की जरूरत पर बल दिया। इस मौके पर अकादमी के उपाध्यक्ष नीरज पाठक के प्रति उपस्थित श्रोताओं ने आभार व्यक्त किया, साथ ही मैथिली लेखक संघ और उपस्थित लेखक बुद्धिजीवी समुदाय ने भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने का पुरजोर समर्थन किया।

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