राम और भारतीय जन-मानस

केशव मोहन पाण्डेय

राम! भारतीय जनमानस के अंतःकरण में बसा नाम। राम का नाम जन-जन को क्षण-क्षण प्रेरित करता है। प्रेरित करता हैं अनाचार का विरोध करने के लिए। प्रेरित करता है बुराई का नाश करने के लिए। प्रेरति करता है राम के आदर्शों का अनुगामी बनने के लिए। राम अठाइसवें चतुर्युगी के त्रेतायुग में हुए राजा थे। राम का चरित्र इतना विशाल है कि आज कलियुग में भी वे घर-घर में, जन-जन के मन में विराजमान हैं। राम ने हिंसा, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान, जुआ, असत्य-भाषण जैसे पापों के करने वाले दुष्टों का नाश करके एक समतामूलक समाज की स्थापना की। उनके समाज की कल्पना मात्र से ही भारतय राजनीति समृद्ध होती है। भोली जनता असंख्य आशाएँ पालती है और उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन को धन्य करती है। उनकी गाथाओं का गान करती अपनी जीवन को सॅल बनाने में लगी रहती है।
महर्षि वाल्मीकि के संस्कृत साहित्य से लेकर नरेश मेहता के ‘संशय की एक रात’ तक और वर्तमान के अन्य साहित्यकारों ने भिन्न-भिन्न उपमाओं, अलंकारों, उद्भावनाओं, कथोपकथनों, कथा-प्रसंगों आदि से राम के चरित्र को वर्णित किया है। राम कथा को लोक मानस तक संप्रेषित करने का प्रयास किया है। हरिवंश पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण, अध्यात्म रामायण, आनंद रामायण, भृशुंडी रामायण, कंब रामायण आदि ग्रंथों द्वारा भी राम कथा का व्यापक प्रचार हुआ है। प्रतिमा नाटक, महावीर चरित, उदात्त राघव, कुन्दमाला, अनर्घराघव आदि नाटकों द्वारा भी राम कथा को लोकप्रिय बनाया गया है, परन्तु राम कथा को जो प्रसिद्धी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा मिली, वह किसी अन्य ने नहीं दिया।
राम का चरित्र लोक मानस का आदर्श चरित्र है। वे हमारे दैनिक जीवन के
प्रेरणा-स्रोत हैं। वे आदर्श व्यक्ति हैं। महानायक हैं। वे ईश्वर के अवतार हैं। दीनानाथ हैं। वे सबके हैं। सभी उनके हैं। ऐसा उदाहरण अन्य कहीं शायद ही प्राप्त हो कि हम जिस सामाजिक ढाँचों पर इतना जोर-जोर से सोचते हैं, उसके विषय में बिना कुछ कहें ही राम ने सब कुछ कह दिया। राम ने अपने समय के अनेक विरोधी संस्कृतियों, साधनाओं, जातियों, आचार-निष्ठाओं और विचार-पद्धतियों को आत्मसात् करते हुए उनका समन्वय करने का साहस किया। साहस के लिए शारीरिक और भौतिक बलिष्ठता की आवश्यकता नहीं पड़ती, हृदय में पवित्रता और चरित्र में दृढ़ता की आवश्यकता पड़ती है। साहस का यह गुण राम में पूर्ण रूप से था। तभी तो उन्होंने कदम-कदम पर साहसिक कार्यों का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस, कवितावली, विनय पत्रिका, दोहावली, उत्तर रामचरित आदि ग्रंथों के माध्यम से, अपनी रससिक्त लेखनी से, सरल शब्द-सर्जना से राम के चरित्र को जैसा प्रस्तुत किया, वैसा कोई अन्य नहीं कर सका। तुलसीदास जब राम को राजा बना देते हैं तब ऐसा लगता है कि राजा शब्द केवल राम के लिए ही बना है। गोस्वामी जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाजवाद की सथापना करना चाहा है। सत्य भी तो है कि सामाजिक मूल्य व्यक्ति के हित और स्वार्थ से ऊपर होते हैं । राम ने भी समाजवाद के इस अर्थ को अपने जीवन में उतारा और अपने आचरणों से लोगों को समझाया भी। वैसे तो संपूर्ण रामचरित मानस यहीं सीख देता है। वास्तव में समाजवाद राम के चरित्र में विशेष महत्त्व रखता है। सत्ता-सुख को त्यागकर, समाजवाद को ढोकर राम ने अपने साहस का परिचय दिया है। त्याग की भावना साहसिक कृत्य का सर्वोच्च उदाहरण है। अगर व्यक्ति में साहस नहीं है, तो जीवन नहीं है। साहस, सत्जीवन का आधार है।
राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी और पिता की आज्ञा पाकर सपत्नी वन जाने को तैयार हो जाना, साहस का ही तो परिणाम है। वे चाहते तो विद्रोह कर बैठते। संभव था कि कारागार में डाल दिए जाते। दर-दर तो नहीं भटकना पड़ता। वैसे तो वे थे सर्व-शक्तिमान! उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था, परन्तु पितृ-आज्ञा को स्वीकार कर उन्होंने एक आदर्श प्रस्तुत किया। राम अयोध्या जैसे देश के युवराज थे। अपनी सारी विलासिता त्यागकर, गंगा तट से रथ भी वापस भेजकर, नंगे पाँव, वल्कल वस्त्र धारण करके वन-पथ पर चल पड़े। राम ने अपने साहस के बूते पर सामान्य जनों के कष्टों की अनुभूति करने के साथ ही आदर्श की भी स्थापना की। चित्रकूट में वास करते समय भेद रहित होकर कोल-भीलों का साहचर्य लिया, –
‘कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।’
वन में ऋषि-मुनियों के अस्थियों को देखकर, दूसरे के दुख से दुखी होकर निसिचर हीन करने का प्रण करना भी कम बड़ा साहसिक कार्य नहीं है! –
‘निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।
साहसी व्यक्ति में एक गुप्त शक्ति रहती है, जिसके बल पर वह दूसरे की रक्षा में अपना प्राण तक उत्सर्ग करने को तत्पर हो जाता है। देश, धर्म, जाति या परिवार वाले के लिए ही नहीं, संकट में पड़े अपरिचित व्यक्ति की सहायता के लिए भी तत्परता बनी रहती है। साहसी व्यक्ति दूसरे के लिए भी हर प्रकार के क्लेशों को हर्षित होकर सहन कर लेता है। राम ने अदम्य साहस का दृष्टांत उस समय भी प्रस्तुत किया, जब प्रवाहमय जलधि की
जलधारा को स्थिर करने का निश्चय किया। सच ही, यह राम का साहस ही था कि समुद्र को मानव रूप धारण कर उनकी शरण में आना पड़ा। राम जैसा व्यक्ति ही संपूर्ण साहस से यह कह सकता है कि प्रजा की खुशी के लिए अर्धांगिनी सीता का परित्याग करने में रंच मात्र भी क्लेश नहीं होगा।
साहसी व्यक्ति कर्तव्यपरायण होता है। उसे अपने कर्मों पर अटूट विश्वास होता है। राम ने भी यहीं किया। वे अच्छी तरह से जानते थे कि रावण महाबलशाली है। उसमें अकूत शक्ति है। उसका बेटा इन्द्र को जीत चुका है। परन्तु सीता की रक्षा के लिए रावण जैसे महापराक्रमी से युद्ध कर के विजयश्री प्राप्त किया।
अपने पूरे वनवास काल में राम ने अत्याचारी व्यक्तियों और अनीतिपूर्ण राज्यों का अंत करके जहाँ राजनैतिक स्थिति को दृढ़ किया, वहीं दंडक वन में खर, दूषण और तृशिरा बंधुओं का संहार भी किया। बालि का वध करके उसके छोटे भाई सुग्रीव को तथा रावण का वध करके उसके छोटे भाई विभीषण को राज्य देकर वसुधा को आसुरी प्रवृत्तियों से मुक्त किया। निषादराज गुह, पंपापुर के राजा सुग्रीव, विभीषण के अतिरिक्त अन्य वानर-भालुओं, कोल-किरातों के साथ मैत्री स्थापित किया। वन की वृद्धा भिलनी शबरी का जूठन खाया। राम के इस
संपूर्ण व्यक्तित्व से उनकी साहसिक प्रवृत्ति ही प्रतिबिंबित होती है। उन्होंने अपने कर्मों से सामाजिक, धार्मिक, बौद्धिक, सभी क्षेत्रों में साहस का परिचय दिया है। निश्चय ही राम अपने इन्हीं गुणों के कारण आज भी मंदिरों के चहारदीवारों के कैद से मुक्त होकर समस्त जन-मन के हृदय पर राज करते हैं। वे सबके प्रेरक हैं। सबके लिए एक्स्ट्रा एनर्जी हैं। राम को निम्नलिखित रूपों में सामाजिक अत्याचार दिखाई देता है, जिसे आज संस्कृति कहा जा रहा है। –
‘बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। ते लंपट
परधन परदारा।।
मनहिं मातु पिता नहीं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
अपने श्रेष्ठ आचरण तथा अद्भुत साहस के साथ राम ने जिस जीवन को भोगा, उसमें अनेक व्यक्तियों का सानिध्य रहा। उनके संपर्क में आने वाले व्यक्तियों में सरल एवं कूटिल-मना, सभी थे। ऐसा देखा जा सकता है कि उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति साहसी हो गया तथा अपने जीवन को धन्य कर लिया। राम भरत के भाई थे। राम के वन गमन के उपरांत भरत को ही सत्तारूढ़ होना था, लेकिन वे ननिहाल से आकर गद्दी पर नहीं बैठे। तपस्वी का जीवन व्यतित करते हुए प्रजा के सामने त्याग और कत्र्तव्यपरायणता का आदर्श रखा तथा राम की ओर से चैदह वर्ष तक राज्य का प्रबंध किया। भरत पर राम को दृढ़ विश्वास भी तो था। –
‘भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।’
लक्ष्मण भी राम के अनुज थे।
उन्होंने भी राज-सुख त्यागकर चैदह वर्ष तक क्षुब्धा और निद्रा को त्यागकर प्रतिबिम्ब की भाँति राम की सेवा किया और आर्दश स्थापना किया। वन जाते समय राम को पार उतारने के लिए केवट ने उनका पाँव धोने के हठ का साहस किया। उनके चरणामृत को लेकर परमगति को प्राप्त हुआ।
राम के चरित्र के साथ मारीच का बहुत निकट का संबंध है। मारीच राम के पौरूष से परिचित था। मोक्ष-प्राप्ति की लालसा में वह स्वर्ण-हिरण बन बैठा। राम के संपर्क में आने पर समुद्र भी अपनी जलधाराओं को स्थिर करने का साहस कर लेता है। गिद्ध जटायु भी रावण जैसे पराक्रमी योद्धा से दो-दो हाथ करने का साहस कर लेता है। राम के संपर्क में आने पर हनुमान समुद्र को लांघकर लंका को जलाने का भी साहस कर लेते हैं। एक राजा के दरबार में जाकर, उसके सामने पाँव जमाने वाले अंगद का साहस भी राम से ही प्रेरित है। राम का साहस हमारी वृत्तियों को उर्ध्वगामी बनाने की प्रेरणा देता है।
राम विष्णु के अवतार और
परब्रह्म स्वरूप हैं। राम में शक्ति, सौन्दर्य तथा साहस का समन्वय है। उनका लोकरक्षक रूप
प्रधान है। वे मर्यादा पुरूषोत्तम और आदर्श के प्रतिष्ठापक हैं। उन्होंने जीवन की अनेक उच्च भूमियाँ प्रस्तुत की हैं। राम ने गृहस्त जीवन की उपेक्षा नहीं की, अपितु लोक सेवा और आदर्श गृहस्त का उदाहरण उपस्थित करके सामान्य जन के जीवन स्तर को भी ऊँचा उठाने का स्तुत्य प्रयत्न किया। राम इतिहास ही नहीं, वर्तमान और भविष्य भी हैं। राम सृष्टि के कण-कण में विद्यमान हैं। वे अन्न और जल के समान सुलभ हैं। वर्तमान राजनैतिक आपाधापी, सामाजिक अस्थिरता और भौतिक आकर्षण के समय में राम के साहस और आदर्श का स्मरण होते ही एक आदर्श समाज की संरचना हृदय-पटल पर चित्रित हो जाती है। ऐसा समाज, जिसमें सभी व्यक्ति अपने
धर्म (कर्त्तव्य) का पालन करते हों। अनीति न हो। वैमनस्य न हो। पारस्परिक स्नेह हो। श्रम की महत्ता हो। सभी स्वावलंबी हो। कुंठा का नाम न हो। परोपकार अनिवार्य भाषा हो।
आज हमें भी अपनी आंतरिक शक्यिों को एकत्रित कर सामाजिक बुराइयों के अंत का प्रण करना ही पड़ेगा। राम और उनके साहस को सार्थक करना ही पड़ेगा। तब पुनः विश्व में भारत का जयघोष होगा। समाजवाद का सोच सार्थक होगा। सामाजिक समरसता
फैलेगी और सभी प्रकार के सुखों से देश भर जाएगा। तब पुनः लिखा जाएगा, –
‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लछन हीना।।
अल्प मृत्यु नहिं कबनिहु पीरा। सब सुन्दर सब निरूज सरीरा।।
समाज की वर्तमान स्थिति में राम की प्रासंगिकता पुनः दृष्टिगत हो रही है। आज समाज में सामाजिक चिंतन छोड़कर केवल वाद ही वाद दिखाई दे रहा है। ‘लोकपाल’ की कल्पना करने वाले शरीर को उपेक्षित कर दिया जाता है। राजनैतिक पार्टियाँ जनता की कोमल और निर्मल भावनाओं के साथ खिलवाड़ करती नजर आ रही हैं। दिल्ली का जंतर-मंतर और रामलीला मैदान अब दूसरी लीलाओं का मंच बन गए हैं। लड़कियाँ, कन्याएँ तथा छात्राएँ डरी-सहमी सी दिखाई देने लगी हैं। अनेक सीताओं का शील हरण किया जा रहा है। आज का रावण दस नहीं, असंख्य चेहरों में जी रहा है। महँगाई डायन सुरसा बनी, जन-सामान्य को निगलने के लिए तत्पर है। हमारे नेता, एक-दूसरे पर बयानबाजियों में ही व्यस्त हैं। भागती जिंदगी अब और क्षणभंगुर हो गई है। सुरक्षा देने वाले बल अब स्वयं ही गोलियों का शिकार हो जाते हैं।
राम! जनता जागती तो है, मगर उसे आपका साथ नहीं मिल पाता। जंतर-मंतर, इंडिया-गेट हो या देश का अनगिनत गली, गाँव, चैबारा, जनता ने सोलह दिसंबर के बाद सब तो किया, मगर कहाँ कुछ मिला? अब तो सात-आठ साल की नन्हीं चिरैया भी सुरक्षित नहीं। राम! आपको एक बार पुनः ‘निसिचर हीन करहुँ महि’ का प्रण करना ही पड़ेगा। एक बार पुनः समता मूलक समाज की वास्तु तैयार करनी ही पड़ेगी। वैसे तो यहाँ सब हैं, लक्ष्मण भी, शत्रुघ्न भी, भरत भी। सीता, रावण और सुरसा भी। बस आप नहीं हैं तारनहार! देश की जनता एक बार पुनः आपका जन्मोत्सव मनाने को तैयार है और तैयार है स्तुति के लिए। –
‘भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप निहारी।’

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