लोक, लोकभाषा और उसका साहित्य

डाॅ. अशोक द्विवेदी@bhojpuripanchayat.in

तेजी से बदलते समय में, आधुनिक जीवन शैली शहरों, महानगरों में रह रहे लोगों को ‘लोक’ से दूर करती जा रही है। आज के आदमी को लोक की आत्मीय सुधि तो आती है पर उसकी आत्मीय-चेतनता, उससे इसलिये जुड़ नहीं पाती क्योंकि लोक परंपरा से मिली सुनने-सुनाने वाली भाषा ही छूट गई है। नई भाषा, जिसमें उसका क्रिया-व्यापार चल रहा है, उसमें लोक के जीवन्त तत्व (संवेदना, सामूहिकता और आपुसी हृदय-संवादिता) लुप्तप्राय हैं ।लोक संवाद होना मुश्किल हो चला है हृदय संवादिता के अभाव में, औपचारिक हो गया है। लिखे-पढ़ों की दुनिया में मोबाइल, इन्टरनेट, कम्प्यूटर से मेसेज भेजने वाली भाषा ने, पुरानी भाषा को जड़ और अनुपयोगी समझ कर छोड़-सा दिया है। आमने-सामने के संवाद की भाव-भंगिमा को पढ़ कर बहुत कुछ समझने के अवसर कम हैं तो आत्मीयता बचे कैसे? पहले लोग बोल-बतिया कर समझाते और ज्ञान देते थे, कहने-सुनने और समझने का माध्यम दूसरे ढंग का था। गुरूकुल, विद्यालय थे। सुनने,रटने, मनन करने का अभ्यास डाला जाता था। अब न तो उस तरह का आत्मीय संवाद है, न ही उसकी सार्थकता। अब लिखित किताब और गूगल गुरू है ।लोक की उस पुरानी भाषा को अर्थहीन बनाने वाले इस दारूण समय में लोकगीत सुन कर अपनी जातीय-चेतनता से नाता बनाये रखने का समय किसी के पास नहीं है ।यह युग तो बस काम भर लेने और बाकी छोड़ने का है।
लोक में बोलना-बताना, सिखाना- समझाना तो बचपन से ही शुरू हो जाता है। फिर जथारथ की खुरदरी जमीन पर उतरना और अनुभव की भठ्ठी पर तपना  होता है। लोक परम्परा में, पुरानी पीढ़ी अपने अनुभवसिद्ध या सीखे समझे ज्ञान को, नई पीढ़ी को सौंपना शुरू कर देती है ।यहाँ सौंपने वाला सौंपते समय दाता नहीं होता ,वह भी अपने देय के साथ ,पुरखों पुरनियों की थाती सौंपता है ,इस आशा और विश्वास के साथ कि लेने वाला उसे संचित संरक्षित रखते हुए अपनी अगली पीढ़ी को सौंपेगा ।सारे संस्कार गीत यही सन्देश देते हैं कि लेने वाला उस थाती या देय को उसी श्रद्धा विश्वास और प्रेम से लेता है। अर्थात वह भी माध्यम ही बनता है, आत्मीय चेतनता को जोड़ने का ।हाँ वह समय और जरूरत के अनुसार कुछ छोड़ता और जोड़ता है। आचार्य विद्यानिवास मिश्र जी ने इसी संदर्भ को खोलते हुए कहा कि ‘परम्परा में स्वीकार -परिहार दोनों चलते हैं। कुछ चीजें छूटती हैं तो कुछ जुड़ती जाती हैं पर एकदम लोप किसी का नहीं होता। विरोध भी परंपरा के प्रवाह में कुछ दूर अलग अलग चल कर ,विरोध नहीं रह जाते, वे विकल्प बन जाते हैं ।श्सच पूछिये यह एक तरह का समायोजन है ।हर पीढ़ी इसी तरह पुराने और नये का समन्वय बिठाती है और परम्परा को आगे बढ़ाती है ।
जिस ‘लोक’ के सर्वजन सुख और सर्वजन हित की भावना पर ‘लोकतंत्र’ की स्थापना हुई, वह तंत्र भी लोक के उस सर्वमंगल के भाव-सुभाव से विमुख होकर कुछ लोगों तक सीमित हो गया है। लोक में जो खास किस्म की स्वछन्दता थी, उसकी भी सीमा, मर्यादा और लोकानुशासन था,
लोकोपवाद का भय उसे पथभ्रष्ट होने से रोकता था पर वही स्वछनदता अब शक्ति और सत्ता, पद और अधिकार के प्रमाद में लोक गरिमा को ठेस लगाती रहती है ।लोक सर्वग्राहिता को महत्व देता है, इसीलिये कि उसकी दृष्टि में मनुष्य, पशु, पक्षी चर-अचर दृश्य-अदृश्य सबका खयाल है। कोई उत्सव हो तो सबके साथ, सबको साथ लेकर कि कहीं कोई छूट न जाय और यह ध्यान रखना ही सर्वग्राहिता है। मांगलिक अवसर हों तो और सावधानी। देवी देवता, पितर, भूले बिसरे पुरखे पुरनियो सभी को न्योतना गाँव की माटी, डीह, चैरे तक की पूजा सबको विनीत भाव से याद करना कि आइये और हमारे अनुष्ठान को अपनी कृपा प्रसाद से अनुग्रिहीत कीजिये। वन्दउँ सन्त असज्जन चरना! पान सुपारी, नव पल्लव, हल्दी-दूब-अच्छत से ही श्रीगणेश होता है उत्सव के दिन या मांगलिक अवसरों पर हृदय का संकुचन विस्तार पाता है ।गाँठे खुलती हैं और पुनः गाँठें जुड़ती हैं।सबके साथ मिल कर, साथ साथ चल कर पारस्परिकता प्रगाढ़ होती है ।
लोक में, निज के बल, पुरूषार्थ को महत्व तब मिलता है जब उससे लोकोपकार लोक मंगल का कार्य निःस्वार्थ संपन्न हो। जब उसके द्वारा सर्व लाभ और सर्वहिताय कार्य किये जायँ। लोकदृष्टि में कोई तब कीर्ति्त अर्जित करता है , जब उसकी  प्रेरणा या पुरूषारथ से लोकमंगल का उद्यम फल देने लगता है। अच्छे राजा ,जमींदार तक को पहले के जमाने में लोकहित की चिन्ता करने और करते रहने की परम्परा ऐसे ही कायम हुई। कुँएँ, बावड़ियाँ, तालाबध्सरोवर खुदवाने, राह घाट जलाशय और फलदार ध्छायादार वृक्ष लगवाने का अभीष्ट यही था कि कोई प्यासा या भूखा न रहे। सुस्ताने की ठाँव मिले, निराश्रित को थोड़ा संबल मिले। जब तक हम स्वयं से बाहर निकल कर, औरों को कुछ नहीं देते, तब तक सारी शक्ति, सारा पुरूषार्थ, सारी कमाई निष्फल है ।एक बहुत प्रचलित लोकगीत यही आशय स्पष्ट करता है —
‘कुँअवाँ खोनवले कवन फल.. झोझवन भरे पनिहारिन तबे फल
बगिया लगाये कवन फल ….राही-बाटी खइहें तबै फल
पोखरा खोनाये कवन फल …गइया जो पीहैं जुड़ पानी, तबे फल !’
यहाँ तक कि पुत्र भी जनम ले तो दुनियाँ को आनन्द दे ! यही लोककामना है। तुलसी बाबा इसी लोकभाव से, अपनी भाषा से यह कामना करते हैं .. ‘भाषा भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सबकर हित होई। ‘यही नहीं बाबा इस लोकमत का आदर करते हुए, आने वाली सन्ततियों को सीख भी देने से नहीं चूकते –’ लोक लखि बोलिये, पुनीत रीति पारखी !’
अनुभूत और मूल्यवान लोकोक्तियों से भरे लोक साहित्य में ,लोक की जीवन -संसकृति झाँकती है और इस मौलिक अभिव्यक्ति में जीवन की भाषा है, जिसे लोकभाषा कहते है वह इसलिए भी कि उसमें मानव जीवन की भाव-भंगिमा, सोच-सरोकार और चिन्ताएँ झलकती हैं लोक साहित्य किसी एक का नहीं समूह का साहित्य है। उसे भले अनाम लोगों ने रचा हो, पर समूह उसे अपना बना लेता है। इसमें बहुत कुछ अनगढ़ लग सकता है पर सहज है। जिस लोक में बुद्धि और अनुभव से अर्जित ज्ञान का महत्व सिद्ध हो, वह उपेक्षणीय कैसे हो जाएगा? एक कहावत है भोजपुरी में ‘लूर से धूरि बटुराला! ‘याने वह कौशल युक्त बुद्धि को अच्छा मानता है, जो ‘कन को अन्न बना दे!’ इसी तरह ‘आधा कहे त मरद बूझे। पूरा कहले बरध ।।’ जरा इस कहावत की तीक्ष्णता तो देखिये। व्यंग्य में ‘सेन्स आफ ह्यूमर’ लिये इन लोकोक्तियों में अद्भुत व्यंजना है’ जेकर बाप गड़ही में डुबलेध्ओकर पूत पौंड़ाक निकलले ! ‘इसी भाँति’ गदहा से इयारीध्लात के सनसनहट !’ समाज का लोकशास्त्र ही अलग है, वह शऊर सिखाता है कि कुसंग के ज्वर से कैसे बचें –‘भल सँग रहबे त खइबे बीड़ा पानध्बाउर सँगे अपनो कटइबे दूनों कान!’ लोकशास्त्र में समाज, परिवार से जुड़ी विसंगतियों पर हँसाने वाली किन्तु भीतर तक पैठ जाने वाली कटूक्तियाँ यूँ ही नहीं प्रचलित हुई होंगी जो आज भी दुहराई जाती हैं —
‘अरकी के भतराध्भुइँयाँ धरीं कि भड़सरा!’
‘मियाँ के ना पावेध्त बीबी के बकोटे।’
‘खँस्सी क जीव जाय, खवइया के सवादे ना !’
‘दुखिया क घर जरेध्सुखिया सें के देहि !’
‘सासु बहुत छोहइली त कहली, ए बहू, भात में गड़हा करे, तनी माठा छोड़ देईं।’
ऐसी न जाने कितनी कितनी लोकोक्तियाँ और कहावतें हैं जो मानव समाज, उसके व्यवसाय, खेती बारी, उसके रहन-सहन से जुड़ी हैं। इन कहावतों में कुछ अशिष्ट और अश्लील मिलता भी है तो वह सहजता से सत्यानुभूति का प्रकाशन है। बनावटी या कृत्रिम नहीं ।ये अनुभूतियाँ भिन्न भिन्न संदर्भ की हो सकती हैं पर ये लोक के जीवनशास्त्र की सच्ची अभिव्यक्तियाल हैं। क्योंकि लोक ने अपने अनुभवों और सत्यान्वेषण के जरिये इन्हें गढ़ा। इनके व्यंग्य में भी यथार्थ की
विडम्बना पर चोट के साथ सीख भी सन्निहित है। गहन, गहरी गंभीर बातों को भी हल्के में कह देने के पीछे लोक द्वारा कटु सत्य भी उद्घाटित कर दिया गया ।इसी लिये आज भी भोजपुरी लोक लोकोक्तियों के अनुभूत ज्ञान और सीख को ,अपनी बातचीत और परस्पर संवाद में प्रयुक्त करता है ।मुहावरों ,कहावतों और लोकोक्तियों से संपन्न भाषा का यह ठेठ ठाट आज भी प्रासंगिक और ग्रहण करने योग्य है ।इसलिये पुरानी संवाद की वह आत्मीय भाषा आज भी प्रयोग से बाहर नहीं हुई । य उस पुराने चावल की भाँति है ,जो पथ्य बन सकता है ।आज भी लोक भाषा का सान्निध्य उस पुराने बैल की भाँति हमें राह भूलने से बचा सकता है (‘पुराने चाउर, पंथ बनेला।’ ‘पुरान बैल,हराई ना भुलाय!’)

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