वसंत आया है

चारो ओर आहट है वसंत की।गाँव-नगर,डाल-फुनगी,वन-उपवन ।हर अँगनाई,हर अंगड़ाई इतराता डोल रहा है अनंग।शीत ने जाते-जाते मौसम के हाथों थोड़ी शीतलता थमा दी है,कलियों ने हँसकर खुशबू।चिड़ियों ने कलरव करके तो कोयल ने हँसकर पंचम सुर के हरकारे भेज सबको वसंतोत्सव का न्योता भेज दिया है।
बेनूर चेहरों पर थोड़ी सी रंगत,उदास होठों पर इत्ती सी मुस्कराहट और बेचैन आत्माओं को पूरी राहत देने के भरपूर प्रयास में है प्रकृति।लेकिन आत्माओं के ताले कम ही खुलते हैं।मन की चेतना रोज़गार के दफ़्तरों में सर पटक ऊँघती है।थके हारे क़दम पीली सरसों देखने नहीं जाते।उन्नति-उन्नति सुनने में लुब्ध कान कोयल की कूक नहीं सुन पाते।
उन घरों में तो वसंत के लिए झरोखे तक बंद हैं जहाँ बेरोजगारी ने संबंधों को खुरच कर भावहीन और निर्मम बना दिया है।लेकिन टेसू हैं कि मानते नहीं ,आम बौराये पड़े हैं।जहाँ से गुजरिये शीतल झोंका मस्ती से छू कहता है…अजी,वसंत है,वसंत है।अनेकों अनाम सुगन्धे रच-बस जाने को आतुर पोर-पोर को जगाती डोलती हैं।खिसियाए खटराग के कान उमेठ दिशाएँ चहचहाती हैं —सुनता नहीं ऋतुराज वसंत आया है….उमंग लाया है।

  • डॉ सुमन सिंह

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