विवाह गीत-लोकमन की आकांक्षा अवरी आशंका

 डाॅ. विन्दा पाण्डेय@bhojpuripanchayat.in – अनादि काल से ही लोक-मन के इच्छा-आकांक्षा, आशा-विश्वास आदि के अभिव्यक्ति लोकगीतन में भइल बा। ये गीतन में लोकमन के आकांक्षा यदि आसमान छुवले बा, त ओही की बीच से न जाने कब आशंका भी सिर उठा लिहले बा। मानव-मन जब भी शंकालु होता तब-तब आशंका उत्पन्न होला। हर काम के पूर्णता-अपूर्णता, सपफलता-असपफलता के बीच आशंका के एगो झीन तार दिखायी देला। ओ झीन-तार के हटा दिहले की बाद जन-आकांक्षा आसमान से बात करे लागेली।
जीवन की पूर्णता खातिर सगरो मानव-जाति में विवाह संस्कार सम्पन्न कइल जाला। ए संस्कार की द्वारा स्त्राी-पुरुष अटूट बन्धन में बन्हा के एगो नया गृहस्थी के निर्माण करेले। पूर्वांचल में विवाह-संस्कार के भीतर बहुत प्रकार के आयोजन होला, जइसे-सगुन, मटिकोड़वा, हरदी, माड़ो, द्वार-पूजा, नहछू, इमली-घोटउवा, गुरहथन, पनिगरहन, कन्यादान, सेनुरदान, मथढक्का, समधे-मिलन आदि। ये सब आयोजन से सम्बन्धित तमाम तरे के गीत गावल
जाला। जवने से वातावरण में हर्ष-उल्लास और बढ़ि जाला, ये गीतन की माध्यम से लोक मन के हर-भाव, हर-ध्ड़कन वेफ छूवल जा सवेफला, चाहें ऊ भाव आकांक्षा के होखे चाहे आशंका के।
बेटी जब बियाह की जोग हो जाली त चिन्ता की मारे माता-पिता के भूख-पियास खतम हो जाला –
दिनवा हरेलू हो बेटी भुखिया रे पियसिया।
रतिया हरेलू हो बेटी बाबा सुख रे निनिया।।
अगर कहीं माता-पिता के ध्यान ये पर नाहीं जात बा त बेटी से भी संकेत मिलि जाला –
नीर चुवत बाबा, नीर चुवत है, नीर चुवेला आधिराति।
माता-पिता कइसे नींद परतु है, जेहि घर कन्या कुँआरि।।
बेटी के बाबा आ पिता जब घर-वर खोजे चलिले त बेटी बाबा के सुझाव देती कि वर कइसन होखे –
धोतिया कचारें बाबा, योथिया बिचारे
हाथ गुलेल मुख-पान।
उनहीं के तिलक चढ़ाइबी मोरे बाबा
मिलि जइहें, दुलरू दामाद।
बेटी की मन में भावी पति के व्यक्तितव के ले के आशंका बा कहीं बाबा मन माफिक वर न खोजी एसे अपने मनमुताबिक वर के सुझाव पहिलही रखि दे ताड़ी। वर धोती कचारें माने चरित्र उत्तम होखे। हाथ गुलेल माने वीर भावना होखे, पोथी विचारें – विद्वान होखें, मुखपान – माने रसिक होखें।
शिव-पार्वती की प्रसंग में एगो गीत आइल बा जवन बेटी की मन के आशंका के निहितार्थ बतावत बा –
गउरा लेई उड़बि, गउरा लेई बुढ़बी
गउरा लेई खिलबो पाताल।
अइसन बउरहवा वर से
गउरा ना विचहबी,
भलु गउरा रहिहें कुँआर।
इहाँ साफ कहल गइल बा कि बेटी के कुँआर राखल ठीक, बाकिर अयोग्य पुरूष की हाथ में दिहल ठीक नाहीं। भोजपुरिया-समाज के स्पष्ट विचार बा बाकी सब बेकार बा।
अपनी सामथ्र्य के अनुसार बाबा त बेटी खातिर ठीके घर-वर खोजिले बाकिर बेटी के भाग्य का बा इ नाहीं जानिले –
ऊसर खेत बेटी कांकरि बोइले
कांकरि के लम्मे-लम्मे पात
कांकरि के बतिया देखत सोहावन
ना जानि तीत की मीठ
ऊँच मयरि देखि तोहरा के बिचहिले
भीतरा मरम जाहि जानि।
एक ठो और कन्या अपने बाबा के तैयार होत देखि के पूछि रहलि बा –
कहाँ के तैयारी बाबा एड़ी लागल धोतिया
कहाँ के तैयारी टेड़ी मांग ये हमरे बाबा।।
बेटी बाबा की आर्थिक स्थिति के खुब ढंग से जानताड़ी, एसे बाबा के सान्त्वना देते पुनः कहेली –
आसन देखि बाबा डासन दिहऽ
मुख देखि दिहऽ वीरा पान।
अपनी सम्पत्ति देखि दहेज दिहऽ
वर देखि दिहऽ कन्यादान।
रामचरित मानस में तुलसीबाबा भी लिखले बानीं –
गाई गिरीस कुस कन्या-पानी।
भवहिं समरपी जानी भवानी।।
ये तरे इ देखल जा सकेला कि दहेज के समस्या आज से नाहीं, आदि से ही बाऽ। ई समस्या ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ की रूप में एक ठो अवरी सामाजिक समस्या के जन्म दे दिहले बा। दहेज-प्रथा के बन्द करे खातिर कब्बे कानून बनि गइल बाकिर दहेज बा कि नदी की बाढ़ि की तरे बढ़ते जात बा। दहेज-हत्या में मरल बेटी की माँ के पीड़ा ये गीत में देखल जा सकेला –
जनतीं की जारल जइबू, आगि में दहेज के।
पाप नाहीं करती ये बेटी, ससुरा में भेजि के।।
विवाह गीतन में कन्या की
अवहेलना अवरी दहेज-प्रथा पर बहुत करारा व्यंग्य भी कइल गइल बा। पुत्री की विवाह पर उत्साहित पति के देखि के माता के पीड़ा व्यंग्य बनि के प्रकट भइल बा –
जाहि दिन ये बेटी तोहरो जनम भइलें
भइली भदउवा निसु-राति।
सासु-ननद घर दियनो ना बारेली
आपु-प्रभु मुखवो ना बोली
मन-पारि ये प्रभु ताहि दिन के बतिया
आजु काहें चन्दन चढ़ायी।
पति के जबाब बा –
धियवा बियाहत बड़ा नीक लागेला
जाहु घरे सम्पत्ति होय।
विवाह गीतन में ये समस्यन के बहुत सरलता से हल कइल गइल बा। ये सन्दर्भ में इ गीत जरूर देखे लायक बा –
छोट मड़उवा ये बाबा साजन लोग बहुत
का उनके खइनी ये बाबा, का उनके लिहनी उधार।
आज भी कुछ लोग चाहें अपवाद स्वरूप ही, अइसन बा जेकरी मन में नीमन कुल-खानदान अवरी सुन्दर बहु के आकांक्षा बा –
हमरा ना चाहीं समधी दान न दहेजवा।
ना चाहीं धन भण्डार ए।
सुन्नर चाहीं हम पतोहिया ये समधी
नीमन कुल धन-धाम ए।।
सगरो भोजपुरी क्षेत्र शक्ति की आराधना के क्षेत्र ह। एही से भोजपुरी क्षेत्र में कवनो शुभ के कार्य होला त ओह में सबसे पहिले शक्ति की आराधना के गीत गावल जाला –
निबियाकी डाड़ि मईया लावेली हिड़ोलवा
कि झुलि-झुलि मईया गावेली गीति हो कि झुलि-झुलि
झुलत-झुलत मईया के लगली पियसिया कि
चलि भइली मलहोरिया आवास मईया चलि भइली
सबकी साथे अपनी शुभ की कामना से भरल इ गीत भारतीय संस्कृति की सूत्र वाक्य – ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया’ के ही भावना से भरल बा। एगो भोली-भाली बालिका सखियन के बीच खेलले में व्यस्त बा कि अचानक बाजा के स्वर सुनि के अपनी माता से पूछेले –
‘‘केकरी दुआरे अम्मा बाजन बाजेला, केकर होला वियाह।’’
माता बतावेली कि ये बेटी तुहरे दुआरे बाजा बाजता आ तोहरे बियाह ह, एतना सुनते बालिका घबरा के कहेले –
‘‘नाही सिखनी ये मईया गुनगिहिथनवा
नाही सिखनी राम-रसोई
सासु ननद मईया तुहे गरिअइहें
मोरा मन सहलो ना जाई।।
माता समझा-बुझा के ओकरे मन की आशंका के मेटावेली –
‘‘सिखि लेहू बेटी हो गुनगिनहिथनवा
सिखि लेहू राम-रसोई।
सासु-ननद बेटी मईया गरिअइहें
लिहय बेटी अँचरा पसारि।।’’
भारतीय माँ-बेटी की मन में प्रतिवाद की स्वर के कहीं स्थान ना देके सुख-दुख सबके अँचरा में बटोरे के शिक्षा दे रहलि बाड़ी। इहे शिक्षा परिवार की नींव के मजबूत बनवले बा।
एगो प्रसंग में बारात अइले के समय होत जात बा, स्वागत-सत्कार के तैयारी नाहीं होता, ई देखि के बेटी चिन्तित हो जाली –
‘‘बाबा ना देखो बाग-बगईचा
बाबा ना देखो धन फुलवारी
कहाँ दल उतरी।’’
लड़की के ई आशंका बा कि अगर बारात के स्वागत सत्कार में कहीं कमी हो जाई त ओकर दुष्परिणाम त ओकरे भोगे वेफ परी। सगरो उपेक्षा आ ताना जिनगि भर सुने के परी। अइसन नाही बा सगरो आशंका कन्या-पक्ष की ओर ही होला। वर पक्ष भी तमाम तरह की आशंका से भरल बा। माता जब पुत्र के परिछ ले ली आ आखिरी बार अपनी आँचर तरे ढ़केली उहाँ उनके मन में ई आशंका का घर क जाला कि आज पुत्र की जीवन में एगो सोगहग-स्त्री के आगमन होखे वाला बा, पता नाहीं आज की बाद हमार पुत्र हमार रहि जाई कि नाही –
‘‘तुहूँ त जाल बाबू सुभवा की देसवा,
दूध के निकड़ मोही देहु।’’
पुत्र माता के आश्वस्त करत कहेले –
दूध के निकड़ मईया नाहीं देई पाइबि
हम होइबी सेवक तोहार
हमहूँ करबि बाबा सेवकइया
धनि होइहें सेवकिनि तोहार।
माता अवरी बहिन लोगन के आशंका एक हो दूसरे गीत में भी देखे लायक बा –
अम्मा जे ठाड़ भइली बेलतर, बहिना बबूर तर।
आरे बजर वेफ छतिया कवन दुल्हा उलटी ना तावेफलें।
एगो बियाह गीत में शुव्र वे बियाह के प्रसंग बा शुक्र बारात साजि के बियाह करे जब चलले त कुछ दूर गइले पर दायें-बायें कौआ बोले लागल। पंडित पोथी उचरलें त पता चलत कि सोने के सिन्होरा त घरहीं छुटल जाता शुक्र दूसरे के ना भेजि के सिन्होरा ले आवे खुदे गइलें –
शुक्र-‘‘खोलहु मईया हो बज्जर केवड़िया
सोने के सिन्होरवा छुटल जाय’’
माँ-‘‘कइसे में खोलीं बाबू बज्जर केवड़िया
अवहीं करिले जेवनार।’’
शुव्रफ-‘‘अवहीं त ये मईया मोरे से जेवे
फेरू कइसे कर जेवनार।’’
माँ-‘‘बिहने त अइहें बाबू तोहरो बहुअवा हो
आत्मा के लिले जुड़वाई।’’
शुक्र की माता की मन में जवन असुरक्षा के भाव उत्पन्न भइल रहे आज भी माता की मन के ओसे मुक्ति नाही मिलल बा। वर्तमान में संयुक्त परिवार के विघटन एकाकी परिवार के प्रचलन की केन्द्र में कहीं न कहीं माता की मन के ई आशंका जरूर बा। हालांकि शुक्र के जब इ पता चलल त उनके निर्णय माता की ही पक्ष में रहे –
फिरहु आजन, फिरहु बाजन, फिरहु साजलि बरियाती
जाहु मारे मईया, आतम दुख होइहें
हम कहबो जनम-जुग कुँआर।
बाकिर माता के आशंका अइसनों नाहीं बा कि अपने बहु अवरी पोता-पोती से भरल घर की आकांक्षा पर भारी परि जा सृष्टि क्रम में बाधा उत्पन्न करे। ऊ त सदा से कहले बा –
बाढ़हु ये वंश, बाढ़हु, बइसे नग्र बेइलि
बाढ़हु रसोइया घर-दुआरि, ओही गज ओबरी
यसूतिका गृह
भारतीय समाज में स्त्री-जीवन में पति की महत्व के व्यापकता कहे के नाही बा। शायद इहे कारण ह कि हरदी-रंगल पत्र पर जब लगन लिखा जाला, तब्बे से लड़की की मन में भावी पति खातिर शुभाशुभ के चिन्ता बनि जाला। एगो बियाह-गीत में बहुते सुन्दरता से ई भाव व्यक्त भइल बा –
आरे-आरे बाबा कवन बाबा हे
मड़उवा छाई ना दीं
भिंजेले मोरे सिर-साहब
चननिया तानी ना हीं।
लड़की के मन अपनी भावी पति के चिन्ता में व्यावुफल बा लेकिन अपने माता-पिता, भाई-बन्धु के भी तनिको कम चिन्ता नइखे –
जेह के भभुरिया जनि अइह हो दुल्हा
सिर मउरी ध्ूमिल होइहे।
बाबा से दहेज जनि मंगिह ये दुल्हा
बाबा मोरे निर्धन बानि।
कन्या के अपनी भावी पति को एगो मधुर विनती या अपने बाबुल की परिस्थिति के समझे खातिर।
लोकमानस में वर-वधू व सबसे सुन्दर जोड़ी राम अवरी सीता वेफ मानल जाला, जब भी वर वेफ कल्पना भइल त सबसे पहिले राम के याद कइल गइल त
वधू की रूप में सीता के। सीता के बियाह में शर्तानुसार शिव-धनुष तोड़े के रहे। ऊ प्रसंग भी बार-बार विवाह-गीतन में आइल बा –
पातर राम पतरी करिअईया हो
शिव-धनुष बजर कठोर
जे एहि धनुष करीहें नव-खण्ड
सीता बियही लेई जाय।
विनबेली सीता सुनु मातु गौरी
बज्जर धनुषवा ये मईया फुलवा-वजन होई जासु
तुलसी बाबा भी कुछ अइसहीं कहले बानी –
मन ही मन मनाव अकुलानी।
होहु प्रसन्न महेश भवानी।।
करहु सफल आपति सेबकाई।
करि हितु हरहु चाप गरूआई।।
सीता की मन में इ आशंका बा कि कहीं कोमल राम ये बज्र के समान कठोर
धनुष के तुरि न पावें त अपनी धर्म अवरी सेवा के भी राम की बल में मिला देली ताकि इ धनुष टूट सके, राम-सीता के सनेह जुड़ सके। सीता के धर्म रहे या राम के बल, धनुस सनेह जुटल। वइसे त भारतीय जनमानस में तमाम चरित्र बा लेकिन बर की रूप में राम के कल्पना लोकमानस यदि सबसे ज्यादे
स्वीकार कइले बा त ओकर एक्के कारण समझ में आइल – राम के एक पत्नीव्रत के प्रतिज्ञा। राजवंशन में बहु पत्नी परम्परा रहल ओह समय में राम के एक पत्नी व्रत के प्रतिज्ञा उनके लोकमानस में योग्यतम वर की रूप में प्रतिष्ठित क गइल, जवन हजारन बरिस बितले की बाद भी ओही तरे कायम बा –
तत्व प्रेम कर मम अरू तोरा।
जानत प्रिया एकु मन मोरा।।
जब बेटी के बारात आवेला ओह बेटा बेटी की बाबा – पिता के मनःस्थिति कइसन हो जाला, ओकर वर्णन बहुते मार्मिकता की साथे तमाम गीतन में प्रकट भइल बा। एगो उदाहरण देखे लायक बा –
आरे नदिया की इरे रे तीरे, अडली बरिअतिया
आरे से हो देखि बेटी के बाबा हनीले रे केवड़िया
बेटी के पिता भयाक्रान्त होके घर के दुआरि बन्द क लिले अवरी बेटी की आगे प्रार्थना की स्वर में खोलिले –
‘‘आरे गढ़ हमरे लुटलें ये बेटी
लुटले – चरनिया
आरे गढ़ के चिरईया ये बेटी
से ही उड़ि रे जइहें।’’
बेटी बहुते सुन्दरता से बाबा के संबोधित करत बाड़ी –
आरे रहीं ना सही ये बाबा, आजु की हो रतिया
आरे बढ़ी रे सबरे जइहें, साजलि बरिअतया।
आरे गढ़ रहउे बाढ़ो ये बाबा, बाढ़ो रे चरनिया
आरे गढ़ के चिरईया ये बाबा, फेरू बसि रे जइहें।
बेटी बाबा के समझावेली – आजु की राति बाबा धीरा धरीं, होत विहाने बराति चलि जाई। आशीर्वाद की स्वर में कहेली – राउर गढ़ – किला, महल, बढ़े, विकास करे। बाढे चरनिया अर्थात पशुधन हाथी-घोड़ा, गाय-बैल आदि, में वृद्धि होखे। चिरईया
अर्थात आपके दुलारी बेटी अपनी मूल से उखड़ि के अर्थात नइहर छोड़ के ससुराल में बसि जाई। आप चिन्ता न करीं।
भारतीय जनमानस में कन्यादान के अत्यन्त पुनीत-कर्म मानल गइल बा अवरी पिता के धर्म भी –
अन्नदान के दान न कहीं
सोना दान जगदीश जी
कन्यादान उत्तिम बढ बाबा
जाहु मन राखहु ज्ञान जी।
एतने नाही भोजपुरी लोक गीतन में पुत्री-जन्म भी धर्म के फलस्वरूप ही मानल गइल बा –
धर्म से धिया जनमिहे ये बेटी, सेवा से आम तइयार।
तप से पुतवा जनमिहे ये बेटी, दान से हंस मझधार।
भोजपुरी समाज में दुनु के आपन-आपन महत्व बा, कवनो किसिम के स्पर्धा नइखे। जीवन की पूर्णता में दुनु के अनिवार्य आवश्यकता बा।
बेटी के अपना मूल से उखड़ि के नयी जमीन में पनपते, पुष्पित-पल्लवित भइले की बीच न जाने, केतना किसिम के दुःख, तकलीफ, भय-आशंका के सहे के परेला, लेकिन दुःख से अधिक तकलीफदेह होला दुख के कारण बनल। बेटी की मन में ई कचोट बा कि हमरे कारन कबो ना झुके वाला बाबा के सिर झुकि रहल बा –
लेई ना कवन बाबा धोतिया
हाथे पाने के बीरा
करीं ना समधी जी से विनती
सिर आजु नेवायी
जवन सिर कबहूँ ना नेवेला
सिर आजु नेवायी
बेटी हो कवन बेटी की कारने
सिर आजु नेवायी।
बेटी की मन के भय-आशंका त जवन बा, बटले बा उनके असली दुख ई बा-
चिटुकी सेनुरवा मँहग भइले बाबा
चुनरी भइल अनमोल
चिटुकी सेनुरवा की कारन बाबा
छुटेला नगर तोहार।
अपनी जन्मभूमि के छोड़ि दिहले के दुख। पं. धरीक्षण मिश्र अपनी कालजयी रचना – ‘कवना दुखे डोलिया में रोवति जाति कनिया’ में बेटी की ये पीड़ा के बहुते
मार्मिकता से प्रस्तुत कइले वानी –
जन्मभूमि छोड़ि देत बानी आजीवन हम
माथ पे चढ़ा के माई-बाप के बचनिया
हमरी बेर बाकी त दुकाहें दो सूखि गइल
बालमीकि, व्यास, कालिदास के कलमिया
हमरा ये त्याग पर लिखाइल नाहीं ग्रन्थ एको
एही दुखे डोली में रोवति जाति कनिया।
बेटी की खोइच्छा में हरदी, दूब, अच्छत, पैसा डालि के विदा कइल जाला। हरही के गाँठि सोहाग, दूब-सन्तति, अच्छत धर्म, पैसा-भौतिक सुख की प्रतीक रूप में दिहल जाला। एक ओर बेटी के वियाह कइल, माता-पिता की जिनगि के सबसे बढ़हन लालसा होला त दूसरी ओर उनके विदा कइल अत्यन्त कठिन पल –
मईया की रोवले गंगा बढ़िअइली
बाबा करेजवा हिलोर।
भईया की रोवले चरन-धोती भिजेला
भउजी की अँखिया ना लोर।
महाकवि कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम’ में शकुन्तला की विदायी की समय कण्व ऋषि जइसन वितरागी व्यक्ति के भी धैर्य छुटे लागल त भला साधरण व्यक्ति कइसे अध्ीर नाही होई।
यास्यत्यद्य शकुंत्लेति हृदयं संस्पृण्ठमुत्कण्ठया
कण्ठः स्तम्भि तवाष्प वृत्ति कलुषश् िचन्ताजडं दर्शनम्।
वैकलव्यं मम तावडीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीडयन्ते गृहीणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः।
लोकगीतन में जेतना की आशंका या आकांक्षा के रूप देखे के मिलल बा
ओसे ई सिद्ध होता कि कहीं त जन-आकांक्षा आसमान से चाँद के उतारि लिहले बा, त कहीं सोने की कटोरा में दूध-भात मंगवले बा। कहीं पुरानी भीति गिरा के नई भीति उठवले बा। बाकीर आज की हालात पर नजर फिरवला पर ई लागता कि जन-आकांक्षा पर जन-आशंका भारी परि जाई, जवने के – दहेज-हत्या, कन्या-भ्रूण हत्या, अनमेल विवाह आदि की रूप में देखल जा सकेला। जेकरी हाथ में जनतन्त्र के बागड़ोर बा ऊ अपनी स्वार्थ सिद्धी खातिर जन-आकांक्षा की साथे खेल खेलि रहल बा। मानव-हृदय में प्रेम जब अजस्र धारा होके प्रवाहित भइल होई तब्बे ये गीतन के रचना भइल होई। अगर ये संवेदना के महसूसल जा सके त आशंका पर विजय पावल जा सकेला। काहे से ये गीतन में आनन्द की भावना से आप्लावित करे के क्षमता बा।
पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ठीके कहले बानी – ‘‘भोजपुरी कई करोड़ लोगन के आशा-आकांक्षा के प्रकट करे वाला सशक्त साधन बा।’’

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