सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे

सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे
डाॅ. रामरक्षा मिश्र विमल

बसंत का आइल, गाँव के इयादि एक-एक क के ऊठत-बइठत आ सूतत खा तंग करे लागलि। होलरि, खातिर रहरेठा, झीली निकाले खातिर

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सरसो के अबटन आ मधि रतिए होलरि-होलरि के आवाज चारों ओरि से। ओही में हमनियो का आवाज में आवाज मिलावत, कान्ही पर होलरि ध के तरना के चलीं जा लरिकाईं में।
एही गाँव-प्रेम में फेसबुक पर अपना गाँव का नाँव से एगो ग्रुपो बना दिहलीं। हम जानत रहीं कि काम भर लोग एहमें नइखन, तबो ई सोचिके कि लोग आजु ना काल्हु अइबे करिहें, संतोष कइ लिहलीं। कई साल पहिले आपन एगो एकाउंट डिएक्टिभेट क देले रहीं आ एकरा बाद जब फेरू से आइल चहलीं त पासवर्ड भुला गइलीं, मोबाइलो नंबर बदलि गइल रहे, माने लफड़ा प लफड़ा। नया एकाउंट का साथे जब एह फील्ड में फेरू से प्रवेश कइलीं त पवलीं कि बड़ा खेला बा एहिजा। कबो-कबो त अइसन लागेला कि उहाँका मुस्कराके रउँआ के पानी भेंट करबि बाकिर कतनो पियास लगला प रउँआ पीयबि ना, काहेंकि जानतानी कि जहाँ पियलीं कि पेट गड़बड़ाइल। माने कर्ट्सी के कर्ट्सी आ बाद बाकी रउँओ बूझतानी आ हमहूँ। जय हो बाबा फेसबुक !
अब फेरू से हमरा अपना गाँव के पीपर याद आ रहल बा, जहाँ हमनीके गरमी के ढेर टाइम कटे, गोदा के कहानी सुनीं जा आ कबो-कबो टेस्टो करीं जा। अब ऊ पीपर ओतना झङाठ नइखे रहि गइल, कऽइ बेर छँटाइल बाकिर आजुओ ऊ हमरा कल्पना में ओइसहीं मदमस्त बा- “ गरमी में तर राखे पिपरा के छाँव रे !” ह्मरा एह प्रिय गीत के मुखड़ा रहे-
नेहिया में डूबल बाटे सभके सुभाव रे !
सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे !
गाँव आजु खूब याद आ रहल बा। जाड़ा भा गरमी का छुट्टी में हम गाँव जाइबि त दुआर प दोस्त-मित्र लोगन से घेराइल रहबि। कवनो प्रोग्राम के छोड़ि दिहीं त अधिकतर राति खा हमरा दुआरे प गवनई का सङहीं खाइलो-पीयल होई हमनी सभ संगीत प्रेमी के। एह में लिट्टी के जबर्दस्त भूमिका रही। बच्चन जी (तारकेश्वर मिश्र), कन्हैया जी(हरिदास स्वामी), मदन जी, चिंताहरन जी, संतोष जी, फणींद्र जी, साधु जी(रामरसिक दास), श्रीराम चैबे जी, नेताजी(हृदयानंद जी), तिवारी जी, अक्षयलाल जी आ टोला-मोहाला का लइकन से शुरू होत दूर-दूर तक लोगन के पता चल जाई कि हम आ गइल बानी आ फेरू त हीत-मीत के संख्या बढ़े लागी। बड़
प्रोग्रामन से नीक हमरा ऊहे लागी आ बहुत इंतजार रही छुट्टी के, बाकिर कुछ साल से मन-मिजाज लरूआ गइल बा। जब जाईं त कुछ अइसन उदासी के माहौल मिली कि मने सुखा जाई आ ओह पर हमरा गाँवके के दू गो रस आ रंग के स्रोत अब बाड़े ना। बच्चन जी महफिल के अँजोर रहन। उनुका रहला से महफिल में जान आ जाई, गावे से लेके हँसी मजाक तक में उनुकर केहू सानी ना रहे। अनूप जलोटा के भजन “श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया” उनुकर प्रिय भजन रहे। उनुका रहला पर कवनो चीज के अभाव ना महसूस होई, जोड़ियो बजावे में एक नंबर के। बात के पक्का आ खाँटी मर्द, केहूँ आँखि देखा के ना निकलि जाई। जब गीत-गवनई के माहौल बनी त दिलदारो एक नंबर के। उनुका चलि गइला का बाद त हमार दिले टूटि गइल। हमनी का सामने के लइका आ अतना पहिले…। कुछ दिन का बाद फेरू बइठकी जमे शुरू भइल। अब कन्हैया जी पर मए दार-मदार आ गइल। सहमिलू आ जीवन का हर रंग से भरल-पूरल व्यक्तित्व। महफिल जमावे खातिर जोड़ी के मास्टर त रहबे कइल, हँसावे खातिर अभिनय से नृत्य तक में ना हिचके ई लइका। तनिको आलस ना, लूती नियन फर-फर उड़ेवाली खनहन देंहि। सेवा भाव के धनी त पहिलहूँ रहन, जबसे
साधू-संत का संघति में अइले तबसे अउरी विनम्र हो गइले। रामकथा के रसिक रहन, प्रवचन करत रहन, धर्मग्रंथन के अच्छा अध्ययन हो गइल रहे। जगियो करावे लागल रहन। एह सभका बादो हमरा खातिर उनुका आदर आ सनेह में तनिको कमी ना रहे। एकदम भक्त नीयन। ई पितृभक्त सपूत अपना बाबूजी के सदमा बर्दाश्त ना कइलसि आ देखत-देखत में हमनी का सोझा से फुर्र हो गइल। एही काल में चिंताहरन जी, संतोष जी, फणींदर जी बाहर-भीतर निकलि गइल लोग, धीरे-धीरे सभ ज्यादा व्यस्त होखे लागल। एकरा बाद भोजपुरिया गवनई में आवत अवमूल्यन आ नित नया-नया चैनलन के बाढ़ि का चलते चैपाल के भूमिका बदले लागलि। अब ऊ मजा कहाँ बा ? बजरिया टोल के डाॅ. शर्मा अभी थम्हले बानी, मदनो मिश्र जी में अब ऊ उत्साह नइखे लउकत, हालाकि अड़ले बानी उहाँका। अपना कई तरह के व्यस्तता में हमरो गइल-आइल आज-काल्हु कम हो गइल बा, एहसे सभके सङेरियो नइखीं पावत।
पिछला दू साल से त जइसे एकदम बीरान हो गइल बा मन के आङन। नगपुरा में बबन मिश्र जी रहीं। हँसमुख आ परोपकारी व्यक्तित्व कहि दिहला से काम ना चली, हर तरह के विषय पर उहाँके सधल आ मौलिक चिंतन होत रहे। दूर तक के सोचत रहीं, गंभीरो ओइसहीं रहीं बाकिर मिलनसार रहीं। गाँव में उहाँके खाली ईजतिए ना रहे लोकप्रियो रहीं। हमरा साथ-साथ भरत शर्मा आ भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से भी उहाँके आत्मीय संबंध रहे। साहित्यकार त ना रहीं उहाँका बाकिर साहित्य-मर्मज्ञ जरूर रहीं। हमरा पर त लरिकाइँए से उहाँके सनेह रहे। शरीर देखिके आ पहिलहीं नियन खिलखिलइला से केहूँ ना कहि सकत रहे कि उहाँका रिटायर हो गइल बानी। जब उहाँके ना रहला के खबर सुनलीं त धक से लागल करेजा में। पिछला साल पड़ोस के ठाकुर जी का साथे भी ऊहे बात। पढ़ाई में जतना तेज, ओतने कर्मठ। पटना के भूमि विकास बैंक में मनेजर रहीं। सभका खातिर समय निकालेवाला, लगातार संघर्ष से शिक्षा, नौकरी आ समाज में एगो बेहतर मुकाम पावेवाला एह व्यक्तित्व से हमहूँ पढ़ले रहीं। बहुत मानत रहीं हमरा के। आदेश मिलल कि रामरक्षा तू पटना आवऽ ना ! घर हम बनवा देबि। एगो बड़हन बल रहे उहाँके हमरा। अब ऊहो बल टूटि गइल। कतना सुनाईं, खाली दरदे परल बा हमरा बखरा में।
फागुन कहाँ गइल ना कुछऊ लगल पता
सावन बा हमरा आँख में आके समा गइल।
आजु एक-एक करके सब याद आ रहल बा। हमरा एगो गजल के मुखड़ा एहू घरी प्रासंगिक लागता –
सूतल सनेह आके के दो जगा गइल
जिनिगी में दरद के बा लहबर लगा गइल ।
पुरवइया आ पछिया आजुओ
ओसहीं गाँवमें बहतिया, चार बजे भोर में गंगाजी नहाएवाला लोगन के आजुओ रेला लागल रहेला बाकिर ई जानिके बहुत दुख भइल हा कि गाँव में अब दुआरे-दुआरे
फगुआ नइखे गवात, देवी-देवता का अस्थाने पर गाइके नेग क लिहल जाता। गीत-गवनई के जमीन हटे हमार गाँव। आजुओ हम सभसे ईहे निहोरा करबि कि –
गम के मारल हिया के मिलेला सुकूँ
हर जुबाँ के गजल गुनगुनावल करीं।

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