हँसियो उधार हो गइल

कइसन कवन पेंच फँसल भइया

भरल घाव जियतार हो गइल ॥

इहवाँ हँसियो उधार हो गइल ॥

 

अनकह जथारथ मनहीं न भावे

करनी बिना बस बख़रा गिनावे

देखs दिनही अन्हार हो गइल ॥ इहवाँ हँसियो…..

 

पसरल अंजोरिया दियरी लजाले

बीच मझधार मे डेंगिया भुलाले

मलाहो क मति बेजार हो गइल ॥ इहवाँ हँसियो….

 

मीन मेख हेरल निहारल लुगरी

सपना भइल अब टहटह पियरी

चकती उहेरल ब्योपार हो गइल ॥ इहवाँ हँसियो….

 

सूझत ना नीमन कवनों डहरिया

जिनगी भइल बा गहिर अन्हरिया

अनही दुख से दुलार हो गइल ॥ इहवाँ हँसियो….

 

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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