प्रेम -दीप

प्रेम -दीप

मोहब्बत के दीये, ऐसे जलाएं, गगन के तारकों से जगमगायें . जहाँ नफरत की आँधी तोड़ती ,दरवाज़ा -ए -मिल्लत , चलो वैसे जहां को, भूल जाएँ . महकते फूल की मानिंद ,कुछ एहसान यूँ कर दें , मचलती तितलियों को खूब भायें. यही अंजाम होना है ,यहाँ पर प्यार वालों का , हँसे दो पल औ फिर आँसू बहायें . कभी दीपक ,कभी जुगनू व सूरज -चाँद सा बनकर , उजालों की नयी महफिल सजायें।…

Read More