काहे को करूं श्रृंगार रे सखिया

काहे को करूं श्रृंगार रे सखिया

काहे को करूं श्रृंगार रे सखिया बालम जो परदेसवा में बा कौन निहारेगा  नाक के नथुनी, कौन निहारेगा आंख के कजरा कौन निहारेगा माथे की बिंदिया काहे को करूं श्रृंगार रे सखिया किसी को सुनाऊंगी ना कोयल सी बोली बन के रहूंगी मैं एक भोली मन मचलाऊंगी ना बाहों की पँखिया काहे को करूं श्रृंगार रे सखिया सब बतियाऊंगी दिलवा के बतिया आएंगे जो साजन ,सेजिया पर रतिया चाहूंगी मैं प्यार, हार नहीं नौलखिया काहे…

Read More