गीतिया सखि रे हम कइसे आजु गाई

गीतिया सखि रे हम कइसे आजु गाई

गीतिया सखि रे हम कइसे आजु गाई ! माइ छठि हे माइ, कइसे हम मनाई !! ताल ना शबद – पद, लय कहाँ पाई ! मुढ़-मति बानी, कइसे के गोहराई !! कहाँ सखि रे हम,शरधा फुल पाई !! !! मधि भवरवां फुल, छत- विछत कइले ! परल जहर फल, साग बिषरस भइले ! दूषित माखन भोग, कइसे हम लगाई !! नदिया-तलइयां दूषित, जल-पत्तर! देहिया पवितर बा,मइल मन- अंतर !! देव सुरुज देव, कइसे अरघ दियाई…

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