लोकभाषा के काव्य आ ओकरा चर्चा पर चर्चा

लोकभाषा के काव्य आ ओकरा चर्चा पर चर्चा

डाॅ. अशोक द्विवेदी@bhojpuripanchayat.in – लोकभाषा में रचल साहित्य का भाव भूमि से जुड़े आ ओकरा संवेदन-स्थिति में पहुँचे खातिर, लोके का मनोभूमि पर उतरे के परेला। लोक कविताई के सौन्दर्यशास्त्र समझे खातिर लोकजीवन के संस्कृति, लोकदृष्टि आ ओकरा अनुभव-सिद्ध मान्यता आ संवेदन-ज्ञान के समझल जरूरी बा। अक्सरहा एघरी, कुछ लोग भोजपुरी साहित्य आ ओकरा कविताई के अपना विचार दर्शन, अपना रूचि-पूर्वाग्रह आ जानल सुनल राजनीतिक-समाजिक अवधारणा आदि का सुबिधानुसार देखे,जाने आ आँके के कोसिस का साथ…

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लोक, लोकभाषा और उसका साहित्य

लोक, लोकभाषा और उसका साहित्य

डाॅ. अशोक द्विवेदी@bhojpuripanchayat.in तेजी से बदलते समय में, आधुनिक जीवन शैली शहरों, महानगरों में रह रहे लोगों को ‘लोक’ से दूर करती जा रही है। आज के आदमी को लोक की आत्मीय सुधि तो आती है पर उसकी आत्मीय-चेतनता, उससे इसलिये जुड़ नहीं पाती क्योंकि लोक परंपरा से मिली सुनने-सुनाने वाली भाषा ही छूट गई है। नई भाषा, जिसमें उसका क्रिया-व्यापार चल रहा है, उसमें लोक के जीवन्त तत्व (संवेदना, सामूहिकता और आपुसी हृदय-संवादिता) लुप्तप्राय…

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