अशोक द्विवेदी के दूगो गज़ल

अशोक द्विवेदी के दूगो गज़ल

डाॅ. अशोक द्विवेदी [ क ] जख्म को दिल में करीने-से सजा लेती हैं पत्तियाँ, पेड़ का हर ऐब छुपा लेती हैं. पत्तियाँ जागते एहसास का समन्दर हैं अपनी हरियाली में, आकाश बुला लेती हैं. पत्तियाँ वक्त के बदलाव को पढ़ लेती है उसकी आहट को, इशारों में जता लेती हैं. उनको परवा‘नहीं, अपमान या सम्मान मिले आपके वास्ते वे खुद को बिछा लेती हैं. धूप हो तेज या बारिश हो, आपकी खातिर पत्तियाँ, कुछ…

Read More

लोक, लोकभाषा और उसका साहित्य

लोक, लोकभाषा और उसका साहित्य

डाॅ. अशोक द्विवेदी@bhojpuripanchayat.in तेजी से बदलते समय में, आधुनिक जीवन शैली शहरों, महानगरों में रह रहे लोगों को ‘लोक’ से दूर करती जा रही है। आज के आदमी को लोक की आत्मीय सुधि तो आती है पर उसकी आत्मीय-चेतनता, उससे इसलिये जुड़ नहीं पाती क्योंकि लोक परंपरा से मिली सुनने-सुनाने वाली भाषा ही छूट गई है। नई भाषा, जिसमें उसका क्रिया-व्यापार चल रहा है, उसमें लोक के जीवन्त तत्व (संवेदना, सामूहिकता और आपुसी हृदय-संवादिता) लुप्तप्राय…

Read More